कानपुरः देश के एक बड़े औद्योगिक घराने से रिश्तेदारी जुड़ने के बाद विक्रम कोठारी की धमक बैंकों और अन्य वित्तीय संस्थानों में बढ़ गई थी। कोठारी के इसी रुतबे के आगे बैंकिंग व्यवस्थाएं और तमाम सारे नियम, कानून बौने साबित हुए। दस्तावेजी खामियों को नजरअंदाज करते हुए सात बड़े बैंकों ने उनके लिए अपना खजाना खोल दिया।
अमर उजाला ने पड़ताल की तो सामने आया कि रुतबे और पैसे के आगे कोठारी ने जब और जितना चाहा, उतना कर्ज उन्हें मिला। बदले में संपत्तियों को बंधक रखने के नियम तार-तार किए गए। बताते हैं कि कोठारी को लोन देने वाले बैंकों के आला अफसरों को इस सेवा के बदले मेवा भी खूब मिली है। यही वजह रही कि कोठारी को दिए गए लोन के बदले 10 से 15 फीसदी कीमत वाली संपत्तियां ही बंधक रखी गईं।
बैंकिंग इंडस्ट्री के सूत्र बताते हैं कि बड़े उद्योगपतियों को जो भी लोन दिया जाता है उसमें बैंकों के सीएमडी और बोर्ड के निदेशक मंडल स्तर के अधिकारियों की सहमति होती है। उन्हीं के हस्ताक्षर से बैंकों का समूह (कंसोर्टियम) बनाकर लोन देने की प्रक्रिया शुरू की जाती है। उद्योगपति को भले ही उसके शहर में उसकी पसंद की शाखा से लोन मिले लेकिन वहां के शाखा प्रबंधक की इच्छा और अनिच्छा मायने नहीं रखती। उद्योगपति विक्रम कोठारी मामले में भी ऐसा ही हुआ। कोठारी को जब भी अपने कर्ज की लिमिट बढ़वानी होती थी, मुख्यालय स्तर से आदेश आ जाता था। बताते हैं कि यहां कोठारी का रुतबा और सेवा के बदले मिली मेवा काम करती थी।