फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कानपुर बुद्धा देवी मंदिर: पांच पिंडियां मिलने से जुड़ा है इतिहास, आज भी चढ़ती हैं हरी सब्जियां, अनोखी परंपरा

Wed, 14 Oct 2026 12:10 PM IST
Himanshu Awasthi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: हटिया (राजगद्दी) स्थित ऐतिहासिक बुद्धा देवी मंदिर में श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है। वर्ष 1936 से जुड़े इतिहास के अनुसार, बुद्धू माली को खेत में पांच पिंडियां मिलने के बाद लाला बद्री प्रसाद ने पुत्र प्राप्ति की मन्नत पूरी होने पर इस मंदिर की स्थापना कराई थी।
विज्ञापन
बुद्धा देवी मंदिर, कानपुर - फोटो : amar ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

कानपुर में राजगद्दी, हटिया स्थित बुद्धा देवी मंदिर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का प्रमुख केंद्र है। मंदिर का इतिहास वर्ष 1936 से पहले का बताया जाता है। मान्यता है कि यहां बुधवार को पांच पिंडियां मिलने के बाद इसी दिन मंदिर की स्थापना हुई। आज भी बुधवार को हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं और माता रानी को हरी सब्जियां अर्पित करते हैं।

विज्ञापन

लोगों के अनुसार उस समय क्षेत्र में चारों ओर खेत थे। यहां बुद्धू माली खेती करते थे। एक बुधवार को उन्हें खेत में पांच पिंडियां दिखाई दीं। उन्होंने इसकी जानकारी अपने मालिक लाला बद्री प्रसाद अग्रवाल को दी। संतान न होने पर लाला बद्री प्रसाद ने पिंडियों को देवी स्वरूप मानकर पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी। मनोकामना पूरी होने पर उन्होंने मंदिर बनवाने का संकल्प पूरा किया।

Trending Videos

http://



तांबे की देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित है

बुधवार को ही मंदिर में स्थापना और पूजन कराया गया। इसी कारण माता का नाम बुद्धा देवी पड़ा। मंदिर में पांच पिंडियों के पीछे दीवार पर तांबे की देवी दुर्गा की प्रतिमा स्थापित है। माता के पास ही एक ईंट रखी है। श्रद्धालु ईंट के नीचे एक रुपया और मन्नत की पर्ची रखते हैं। मान्यता है कि इससे मनोकामना पूरी होती है। लोग बताते है कि बुद्धू माली पहले खेत में उगी हरी सब्जियां माता को अर्पित करते थे, फिर घर भेजते थे।

आज भी मंदिर की सेवा में जुटी है चौथी पीढ़ी
यही परंपरा आज भी जारी है। मंदिर में मुंडन और विवाह जैसे शुभ कार्यों से पहले दर्शन की विशेष मान्यता है। दूल्हा बरात लेकर निकलने से पहले माता के दरबार में माथा टेकता है, जबकि विवाह के बाद दुल्हन भी घर जाने से पहले दर्शन करती है। प्रत्येक बुधवार को माता का भव्य शृंगार किया जाता है। बुद्धू माली के कुशवाहा परिवार की तीसरी और चौथी पीढ़ी आज भी मंदिर की सेवा में जुटी है। परिवार के आठ सदस्य बारी-बारी से 15 दिन की जिम्मेदारी निभाते हैं।
विज्ञापन

तीसरी पीढ़ी के हाथ में मंदिर की जिम्मेदारी
मंदिर के प्रबंधक विनीत अग्रवाल ने बताया कि उनके बाबा ने 1936 में बुद्धा देवी महारानी ट्रस्ट कमेटी बनाई थी। उनके पिता बृजेंद्र कुमार अग्रवाल इसकी देखरेख करते थे। वर्ष 2019 में पिता के निधन के बाद वह जिम्मेदारी संभाल रहे हैं। मंदिर परिसर में बने मकानों के किराये से रखरखाव किया जाता है, जबकि चढ़ावा माली परिवार को मिलता है। उन्होंने कहा कि वर्ष 1974 से उन्होंने मंदिर से जुड़ी मान्यताओं और परंपराओं को करीब से देखा है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें