प्रस्तावित जांच समिति में जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के विशेषज्ञ डॉक्टरों को भी शामिल किया जा सकता है, ताकि मेडिकल रिपोर्ट की निष्पक्ष समीक्षा हो सके। अखिलेश दुबे इस समय उर्सला अस्पताल में भर्ती हैं। चिकित्सकों के अनुसार उन्हें सेप्टीसीमिया, यूटीआई, ब्लड प्रेशर और शुगर की समस्या है। इसके अलावा लिगामेंट इंजरी और घुटना प्रत्यारोपण के लिए उन्हें हायर सेंटर रेफर किए जाने की भी बात सामने आई है।
उर्सला अस्पताल के डॉक्टरों द्वारा तैयार की गई मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, अखिलेश दुबे कई गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं। डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में सेप्टीसीमिया (खून में संक्रमण), यूटीआई (यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन), हाई बीपी और शुगर का जिक्र किया है। इसके साथ ही लिगामेंट इंजरी का हवाला देते हुए उन्हें घुटना प्रत्यारोपण के लिए 'हायर सेंटर' (किसी बड़े मेडिकल संस्थान) रेफर करने की सिफारिश की गई है। प्रथम दृष्टया यह एक गंभीर मरीज की प्रोफाइल लगती है, लेकिन विवाद यहीं से शुरू होता है।
अखिलेश दुबे की इन बीमारियों को 'अखिलेश मुक्ति मोर्चा' और उनके विरोधियों ने सिरे से खारिज कर दिया है। जिलाधिकारी कार्यालय में दी गई शिकायत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अखिलेश दुबे केवल बीमारी का स्वांग रच रहे हैं। आरोप लगाया गया है कि जेल या किसी कड़ी कानूनी कार्रवाई से बचने के लिए उन्होंने अस्पताल को अपनी सुरक्षित पनाहगाह बना लिया है। मोर्चा का यह भी कहना है कि इस पूरे खेल में उर्सला के कुछ डॉक्टर और कर्मचारी भी शामिल हैं, जो फर्जी रिपोर्ट तैयार कर उन्हें अस्पताल में रोके रखने में मदद कर रहे हैं।
इस पूरे विवाद का सबसे तकनीकी और संदिग्ध हिस्सा 'सेप्टीसीमिया' की जांच रिपोर्ट है। उर्सला अस्पताल के स्टाफ के बीच ही चर्चा है कि पैथोलॉजी विभाग द्वारा जारी की गई रिपोर्ट में टीएलसी (Total Leucocyte Count) का स्तर सामान्य मानकों से मेल नहीं खा रहा है। चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि किसी मरीज को वास्तव में सेप्टीसीमिया है, तो उसके रक्त में टीएलसी का स्तर 11 हजार से काफी ऊपर होना चाहिए। आरोप है कि उर्सला की रिपोर्ट में आंकड़ों के साथ हेरफेर किया गया है। चर्चा यह भी है कि यदि यही जांच किसी अन्य स्वतंत्र लैब या जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज में कराई जाए, तो परिणाम पूरी तरह अलग आ सकते हैं।
मामले की गंभीरता और सार्वजनिक रोष को देखते हुए जिलाधिकारी ने कड़ा रुख अपनाया है। पहले मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने इस मामले की जांच करने से हाथ खड़े कर दिए थे, लेकिन विवाद बढ़ने पर डीएम ने सीधे उर्सला निदेशक डॉ. बीसी पाल को पत्र लिखकर 'पारदर्शी जांच' के निर्देश दिए। डीएम के निर्देश के पीछे का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग किसी व्यक्ति विशेष को बचाने के लिए किया जा रहा है?
सूत्रों की मानें तो इस जांच समिति में उर्सला के डॉक्टरों के बजाय जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के वरिष्ठ प्रोफेसरों और विशेषज्ञों को शामिल किया जाएगा। इसका कारण यह है कि उर्सला के डॉक्टरों पर पहले से ही मिलीभगत के आरोप लग रहे हैं। एक स्वतंत्र जांच टीम जब अखिलेश दुबे का नए सिरे से परीक्षण करेगी और उनके रक्त के नमूने लेगी, तभी यह स्पष्ट हो पाएगा कि उन्हें वास्तव में संक्रमण है या उनकी रिपोर्ट 'मैनेज' की गई है।
डीएम का पत्र मिलने के बाद उर्सला निदेशक डॉ. बीसी पाल ने जांच समिति गठित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। हालांकि, अस्पताल के भीतर एक डर का माहौल भी है। यदि जांच समिति यह पाती है कि पिछली रिपोर्ट फर्जी थी, तो उन डॉक्टरों पर गाज गिरना तय है जिन्होंने अखिलेश को भर्ती किया और उन्हें रेफर करने की सिफारिश की। सरकारी सेवा नियमावली के तहत यह एक गंभीर अपराध माना जाएगा।
अखिलेश दुबे मामले ने कानपुर के स्वास्थ्य तंत्र की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया है। आने वाले कुछ दिनों में जब जांच समिति अपनी रिपोर्ट सौंपेगी, तो वह न केवल अखिलेश दुबे के स्वास्थ्य की स्थिति स्पष्ट करेगी, बल्कि सरकारी अस्पतालों में होने वाली 'वीआईपी सेटिंग्स' की पोल भी खोल सकती है। जनता की नजरें अब मेडिकल कॉलेज के उन डॉक्टरों पर हैं, जिन्हें 'दूध का दूध और पानी का पानी' करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।