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कन्नौज: किंग नहीं बने, किंगमेकर की भूमिका में रहे मुस्लिम वोटर

Mon, 29 Apr 2024 02:00 PM IST
शिखा पांडेय तारिक इकबाल, अमर उजाला, कन्नौज

सार

कन्नौज संसदीय सीट पर करीब 20 फीसदी हैं मुस्लिम मतदाता। अभी तक किसी भी मुस्लिम उम्मीदवार ने चुनाव नहीं जीता।
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कन्नौज द्वार - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इत्रनगरी के वोटरों ने बाहर से आए लोगों को खूब गले लगाया और कामयाब बनाया। कांग्रेस और भाजपा जैसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी के मुकाबले छोटी पार्टियों को खूब मौका दिया। सबसे ज्यादा सात बार सपा को मौका दिया। भाजपा और कांग्रेस को दो-दो बार जिताया। दो बार महिलाओं को भी मौका दिया। अगड़े और पिछड़े भी जीते। नहीं जीते तो मुस्लिम उम्मीदवार। मुस्लिम उम्मीदवार कभी भी यहां के वोटर का भरोसा नहीं जीत सके।

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सियासत के जानकार बताते हैं कि कन्नौज संसदीय सीट पर करीब 20 लाख वोटर हैं, उसमें सबसे ज्यादा 20 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं। यहां हुए 16 चुनाव में कामयाबी हासिल करने वालों में मुस्लिम वोटरों का बड़ी भूमिका रही है। जिसे चाहा उसे खुशबू के शहर की कुर्सी सौंप दी। लेकिन कभी खुद नुमाइंदगी के लिए दिल्ली नहीं पहुंचे। एक हकीकत यह भी है कि इस सीट पर मुस्लिम वोटरों की संख्या ज्यादा होने के बावजूद सियासी पार्टियां इस वर्ग से जुड़े चेहरे को टिकट देने से परहेज करती हैं। यह भी एक सच्चाई है कि इस वर्ग का भरोसा जीतने के लिए सियासी पार्टियां खूब जतन भी करती हैं। हैरानी यह कि इस वर्ग के वोटरों के भरोसे अपनी कामयाबी का मंसूबा पालने वालों ने टिकट देने के लिए भरोसा नहीं जताया। वर्ष 1967 से यहां हुए अब तक के 16 चुनाव में इक्का-दुक्का मुस्लिम चेहरे ही सामने आए हैं। उन्हें भी कामयाबी नसीब नहीं हो सकी है।

नगर निकायों में दबदबा, तीन पार्टी से तीन चेहरे
संसदीय चुनाव में भले ही मुस्लिम चेहरे को नुमाइंदगी का मौका नहीं मिला हो, लेकिन नगर निकायों में दबदबा जरूर रहा है। यहां तीन नगर पालिका और पांच नगर पालिका क्षेत्र हैं। इनमें अलग-अलग चुनाव में अलग-अलग कई मुस्लिम चेहरों को कामयाबी मिली है। इस समय जिले में तीन निकायों में मुस्लिम चेहरे नुमाइंदगी कर रहे हैं। कन्नौज सदर नगर पालिका से बसपा के टिकट पर पूर्व चेयरमैन हाजी रईस अहमद की पत्नी कौसर जहां पालिकाध्यक्ष हैं। तालग्राम नगर पंचायत में सपा के टिकट से मोहसिन खां चेयरमैन हैं। समधन नगर पंचायत में कांग्रेस के टिकट से आसमा बेगम अध्यक्ष हैं। छिबरामऊ, गुरसहायगंज और सौरिख में भी मुस्लिम चेहरे दबदबा दिखाते हुए कड़ी टक्कर दी, कामयाबी से थोड़ा फासला रहा था। छिबरामऊ और सौरिख में भी मुस्लिम उम्मीदवार काे कामयाबी मिलती रही है।

 

विधानसभा भी नहीं पहुंचे
लोकसभा चुनाव की ही तरह विधानसभा चुनाव में भी कभी मुस्लिम चेहरे को नुमाइंदगी का मौका नहीं मिला है। जिले में तीन विधानसभा सीट हैं। इसमें कन्नौज सदर, छिबरामऊ और तिर्वा हैं। सिर्फ छिबरामऊ विधानसभा क्षेत्र से ही अब तक दो बार 2012 और 2017 में बसपा के टिकट पर ताहिर सिद्दीकी चुनाव लड़े, लेकिन दूसरे नंबर तक ही पहुंच सके।

 

16 चुनाव में आठ बार कोशिश, नहीं मिली कामयाबी
कन्नौज संसदीय सीट से अब तक कई चेहरों ने कोशिश की है, लेकिन कामयाबी से दूर रहे हैं। सबसे पहले वर्ष 1984 में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की पार्टी से ख्वाजा हलीम ने कोशिश की थी, लेकिन तब कांग्रेस की लहर में शीला दीक्षित जीती थीं। वह पांचवें नंबर पर रहे थे। उसके बाद 1989 और 1991 में मोइनुद्दीन बिना किसी पार्टी के टिकट के निर्दलीय लड़े, कामयाबी नहीं मिली। 1996 में पहली बार एक साथ तीन मुस्लिम उम्मीदवार मैदान में आए। तीनों की जमानत जब्त हुई। उस चुनाव में 31 म्मीदवार थे। नतीजा आया तो सैय्यद वारिस अली छठे नंबर पर रहे। रईस बेग 16वें और जलील खान को 25वें पायदान पर रहे। 1999 में मुलायम सिंह यादव के सामने औसाफ वारसी 16 उम्मीदवार में सातवें नंबर पर रहे। 2000 में बसपा के टिकट पर अहमद डंपी पहली बार कड़ी टक्कर देकर दूसरे नंबर पर रहे। 2009 में अखिलेश यादव के सामने शहंशाह खान सातवें नंबर पर रहे। 2014 में डिंपल यादव के सामने आम आदमी पार्टी से इमरान बिन जफर पांचवें नंबर पर रहे।

 
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तब डंपी ने दी थी टक्कर, अब मैदान में इमरान बिन जफर
अब तक के चुनाव में सिर्फ वर्ष 2000 का उपचुनाव ही ऐसा रहा, जब किसी मुस्लिम चेहरे ने कड़ी टक्कर दी। तब यहां से अपने सियासी कॅरिअर का आगाज करने आए सपा के अखिलेश यादव के सामने बसपा ने पूर्वांचल के कद्दावर नेता अकबर अहमद डंपी को मैदान में उतारा था। उस चुनाव में डंपी ने खूब जोर दिखाया। उनके चुनाव प्रचार ने सपा की मुश्किल बढ़ा दी थी। हालांकि वह अखिलेश यादव के मुकाबले 58,725 हजार से ज्यादा वोट से चुनाव हार गए। अब करीब ढाई दशक बाद फिर से बसपा ने मुस्लिम चेहरे के रूप में इमरान बिन जफर को मौका दिया है। उनके पहले यहां से रसूलाबाद निवासी अकील अहमद पट्टा को उम्मीदवार बनाया गया था, बाद में उनकी जगह इमरान बिन जफर को टिकट दिया। इमरान बिन जफर 10 साल पहले वर्ष 2014 में आम आदमी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ चुके हैं। देखने वाली बात होगी कि वह वर्ष 2000 में अकबर अहमद डंपी जैसा जोर लगा पाते हैं या नहीं।
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