वक्री बृहस्पति का राशियों पर पड़ेगा असर
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देवताओं के गुरु बृहस्पति 30 जून को उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में भोर 3:07 बजे केतु के साथ मकर से धनु राशि में प्रवेश करेंगे। ज्योतिषाचार्य पंडित केए दुबे पद्मेश के मुताबिक, वक्री ग्रह केतु के साथ बृहस्पति की विशिष्ट युति बन रही है। इस परिवर्तन से बृहस्पति भी वक्री होगा।
वक्री बृहस्पति अधिक बलशाली होता है। वक्री का मतलब वापसी से है। ऐसे में प्रवासी कामगार अपने काम पर उन शहरों को लौटेंगे, जहां से वे घर आए हैं। बृहस्पति देवोत्थानी एकादशी (20 नवंबर) तक धनु राशि में रहेंगे। ज्योतिषाचार्य पद्मेश के मुताबिक, केतु और बृहस्पति की विशिष्ट युति राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक परिवर्तन भी लाएगी।
गुरु की भारतीय संस्कृति और विश्व पर प्रभुसत्ता है। इस कालखंड में यदि कोई अच्छे व्यक्ति के सानिध्य में आता है तो वह अच्छा हो जाएगा और खराब व्यक्ति के संपर्क में आता है तो खराब हो जाता है। 30 जून से 20 नवंबर तक की अवधि में ऐसे प्रवासी मजदूर, जो कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन में घरों को लौट आए हैं, फिर से अपने काम पर लौट जाएंगे।
वहीं, ज्योतिषाचार्य आचार्य मनोज कुमार द्विवेदी का कहना है कि जब भी कोई शुभ ग्रह वक्री अवस्था में किसी राशि में पहुंचता है तो वह जातकों के जीवन पर अनुकूल प्रभाव डालता है। धनु राशि में बृहस्पति के प्रवेश से जातकों को लाभ होगा।
राशियों पर यह पड़ेगा असर
मेष - मस्तिष्क नकारात्मक विचारों से मुक्त रहेगा। सकारात्मक दृष्टिकोण से आगे बढ़ेंगे।
वृषभ- यह गोचर मिश्रित प्रभाव लेकर आने वाला है।
मिथुन- आपसी रिश्ते मधुर होंगे। दांपत्य जीवन की समस्याओं का निदान होगा।
कर्क- मिलाजुला परिणाम रहेगा। कष्ट मिलेंगे और कष्टों से बाहर आने का साहस भी मिलेगा।
सिंह- योजनाओं को साकार रूप देने के लिए यह समय पूरी तरह अनुकूल है।
कन्या - सुख-सुविधाओं के साथ मानसिक शांति में भी वृद्धि की संभावना है।
तुला- साहस और पराक्रम में वृद्धि होगी। नए प्रयास और जोखिम भरे कार्य करेंगे।
वृश्चिक- जो नया व्यवसाय प्रारंभ करना चाहते हैं उनके लिए समय अच्छा साबित होगा।
धनु- आपका स्वभाव पहले से बेहतर होगा।
मकर- शुभता मिलेगी। खासकर एक्सपोर्ट का काम करने वालों और विदेश में काम करने वालों को लाभ होगा।
कुंभ- आय के नए स्त्रोत खुलने वाले हैं। योजनाएं बनाकर बैठे हैं तो उनके लिए यह समय सबसे अच्छा है।
मीन- अगर नौकरी बदलने की उम्मीद कर रहे हैं तो बदलाव संभव हो सकता है। शत्रु पक्ष पर विजय मिल सकती है।
जानें बृहस्पति के बारे में
नवग्रहों में देवगुरु बृहस्पति सबसे बड़ा और प्रभावशाली ग्रह है। बृहस्पति का संबंध शुभ कार्यों से है। यह सदाचार, सद्गुण, सत्यता, विवेक, दार्शनिकता आदि प्रदान करते हैं। कुंडली में द्वितीय, पंचम, नवम, दशम एवं एकादश भाव का कारक है। यह पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के स्वामी हैं। बृहस्पति बारह महीनों में चार महीने वक्री रहते हैं। बृहस्पति एक राशि में लगभग एक वर्ष रहते हैं। 12 राशियों का चक्र पूरा करने में उन्हें करीब साढ़े बारह से तेरह वर्ष लगते हैं।