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जेके कॉटन बंदी की ओर

Sat, 31 Jan 2015 03:02 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला कानपुर
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जेके कॉटन मिल पर फिर से बंदी के बादल छा गए हैं। मिल को प्रति माह लगभग तीन से सवा तीन करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है। कंपनी के सभी रिटेल शोरूम भी नुकसान में हैं।
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कंपनी के एडवाइजर और बाइफर निदेशक अनिल गुप्ता के मुताबिक मिल चलाने में काफी खर्चा हो रहा है। कर्मचारी काम नहीं करते हैं। खर्चों को कंट्रोल करने के लिए हाल में छंटनी की गई है। मिल को चलाना बहुत ही मुश्किल है।  

उन्होंने बताया कि जेके ग्रुप ने पिछले चार वर्षों में मिल को चलाने के लिए 180 करोड़ रुपये खर्च किए लेकिन सारा पैसा पानी हो गया है। उन्होंने बोर्ड में चार बार कहा है कि इस तरह से मिल नहीं चल पाएगी। मिल चलाने में काफी लागत आ रही है।
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बिजली का प्रति यूनिट खर्चा आठ रुपये है जबकि अन्य राज्यों में मात्र पांच रुपये प्रति यूनिट बिजली की दर है। गुजरात में बिजली पर सरकार सब्सिडी भी दे रही है। यहां इंफ्रास्ट्र्क्चर नहीं है। रॉ मैटेरियल (धागे की मिल) की उपलब्धता कानपुर में नहीं है।

फिनिश्ड प्रोडक्ट कानपुर में नहीं बिक रहा है। एक्सपोर्ट का जरिया कानपुर में नहीं है। कपड़े के ज्यादातर मैन्यूफैक्चरर मुंबई, अहमदाबाद, बंगलौर और दिल्ली में हैं। ऐसे हालात में मिल को चला पाना बहुत मुश्किल है।

उन्होंने बताया कि मिल मालिकों से टेक्सटाइल यूनिट को दूसरे राज्य में शिफ्ट करने को कह चुके हैं ताकि वहां पर कम लागत में मिल को चलाया जा सके।

जेके कॉटन के उप महाप्रबंधक पीके जैन ने बताया कि मिल से मालिकों के सेंटीमेंट जुड़े हैं। वह अपनी मदर इंडस्ट्री की वजह से इसे चला रहे हैं। अगर एक रिजनेबल लेवल तक उनको लॉस होता रहेगा तो भी वह मिल चलाते रहेंगे।

उन्होंने माना कि वर्तमान में प्रोडक्शन घटा है। रॉ मैटेरियल नहीं है। फाइनेंस नहीं है। दिसंबर माह का वेतन भी अधिकारियों को नहीं दिया गया है। बैंक फाइनेंस में दिक्कत है।

छंटनी के मुद्दे पर कहा कि लागत घटाने के लिए विगत कुछ दिनों के दौरान लगभग 100 कर्मियों की छंटनी की गई है। टेक्निकल स्टाफ के तहत अधिकारियों, सुपरवाइजर, ट्रेेनीज को हटाया गया है।

वर्करों को कम हटाया है। उन्होंने कहा कि कानपुर में लोगों के पास परचेंजिंग पॉवर नहीं है। हमारी कास्टिंग ज्यादा है। ग्राहक भी जहां सस्ता प्रोडक्ट मिलेगा वहीं से लेगा। वर्कआउट किया जा रहा कि कैसे कम खर्चा किया जा सके।

उन्होंने बताया कि कुछ टेक्निकल प्रॉब्लम की वजह से जो क्वालिटी आनी चाहिए थी वो क्वालिटी कपड़े की नहीं आ पाई। इसकी एक वजह अनस्किल्ड लेबर भी है। पुराने वर्करों की एक मानसिकता बन गई है कि वे न तो काम करेंगे और न ही करने देंगे।

हम कहते हैं कि भले ही वे कम कपड़ा बनाएं लेकिन परफेक्ट बनाएं, लेकिन वे नहीं बनाते। उनको विश्वास हो गया है कि दो, तीन साल की नौकरी रह गई है। उन्होंने कहा कि वर्कर काम करने लगें, क्वालिटी थोड़ी सी इम्प्रूव हो जाए तो हम प्राफिट में आ जाएंगे।

इससे प्रोडक्शन बढ़ेगा जिससे लागत घटेगी। वर्तमान में जेके कॉटन में विभिन्न पदों पर लगभग 750 कर्मचारी काम कर रहे हैं। मिल पर अभी भी लगभग तीन सौ करोड़ रुपये की देनदारियां बाकीं हैं जो श्रम न्यायालय, कानपुर और उच्च न्यायालय में विभिन्न कर्मियों द्वारा विचाराधीन हैं।
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