कानपुर। श्रीराम लीला सोसाइटी की ओर से आयोजित रामकथा के छठवें दिन रविवार को मंदाकिनी दीदी ने राक्षसी सिंहिका के दृष्टांत से ईर्ष्यावृत्ति की व्याख्या की। उन्होंने कहा कि हनुमान जी की लंका यात्रा के समय सिंहिका मिली। वह ईर्ष्या का प्रतीक है। हनुमान जी ने एक ही वार में उसका वध कर दिया। ईर्ष्या चरित्र की कालिमा होती है। यह व्यक्ति की छाया पकड़ती है। कहा जेन जी को खासतौर पर इस वृत्ति को समझकर सावधान रहना चाहिए।
रामकथा का आयोजन मर्चेंट चैंबर हॉल में हुआ। शुरुआत महाआरती और ओमकार जाप से हुई। मंदाकिनी दीदी ने कहा कि जब दूसरों के सुख को देखकर आपको दुख और जलन हो तो समझ लीजिए कि आप के अंतःकरण की गहराइयों में सिंहिका नाम की राक्षसी सक्रिय है।
यह देहाभिमानी व्यक्ति के हृदय में निवास करती है। सिंहिका की प्रतीकात्मक व्याख्या करते हुए कहा कि ईर्ष्यालु व्यक्ति कभी यह नहीं प्रदर्शित करता है कि उसमें ईर्ष्या है। सिंहिका समुद्र में रहकर जलचरों को नहीं खाती, आकाश में ऊपर उड़ान भरने वाले नभचरों को खाती है। यही तो जीवन का सत्य हमें रामचरित मानस रूपी दर्पण में दिखाई देता है। अपने बराबर के लोगों से ईर्ष्या नहीं होती, जो हमसे आगे बढ़ा रहा है, ऊपर उठ रहा है, उससे जलन होती है। वरिष्ठ उपाध्यक्ष राजीव गर्ग, कमल किशोर अग्रवाल, राकेश गर्ग, अमरनाथ मल्होत्रा, पवन अग्रवाल आदि भक्तगण उपस्थित रहे।