कानपुर। मकनपुर के मदारिया सिलसिले के मलंगों के चिमटों और पश्चिमी बंगाल के शैव संतों के त्रिशूलों के साथ स्वतंत्रता संग्राम की रणभेरी सबसे पहले 1760 में बजी थी। यही चिंगारी 1857 तक पहुंचकर क्रांति बन गई। इससे मदारिया सिलसिले से जुड़े लोग ब्रितानी हुकूमत के निशाने पर आ गए। ब्रितानी हुकूमत ने खूब खून बहाया। मकनपुर की हथिनी इमली इसकी गवाह बनी। मदारिया सिलसिले से संबंधित पुस्तकों के रिकॉर्ड के मुताबिक इमली के पेड़ पर काफी क्षेत्रीय लोगों को फांसी दी गई। कुछ को काला पानी भेजा गया।
हजरत सैयद बदीउद्दीन अहमद जिंदा शाह कुतुबुल मदार (रजि.) के सिलसिले के मलंग मजनूं शाह, इराहुल शाह, मूसा शाह आदि ने ब्रितानी हुकूमत का आम भारतीयों पर जुल्म देखकर शैव संतों के साथ पश्चिमी बंगाल से विद्रोह का झंडा बुलंद किया। इसे आम जनता का सहयोग मिला तो लहर बिहार तक पहुंच गई। यह विद्रोह 1800 तक चलता रहा। अंग्रेजों ने बड़ी क्रूरता के साथ इसे कुचला। मजनूंशाह बुरी तरह जख्मी हुए। उनकी इच्छा पर उन्हें मकनपुर में दफनाया गया। मदारिया सिलसिले के मुफ्ती सैयद शजर अली मदारी ने अपनी पुस्तक मलंग में ब्रितानी हुकूमत के खिलाफ मलंगों और संतों के विद्रोह का जिक्र किया है। उन्होंने बताया कि वर्ष 1760 में शुरू हुआ मलंगों और संतों का विद्रोह जाहिर में तो अंग्रेजों ने कुचल दिया लेकिन वह आग बनी रही। वर्ष 1857 की क्रांति के दौरान हथिनी इमली पर दो सप्ताह तक स्वतंत्रता के दीवानों को पकड़-पकड़कर लटकाया जाता रहा। इन्हीं रणबांकुरों के विद्रोह को ब्रितानी हुकूमत ने पागलपंथी की संज्ञा दी थी। इस पंथ में मलंग और शैव संत रहे हैं। तब से यह शब्द एक मुहावरा बन गया जो आज तक लोगों की जुबान पर बना हुआ है।