कानपुर। फिल्म अभिनेता इरफान खान के धर्म पर दिए बयान को विवादित मानते हुए कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवियों ने निंदा की है। उनसे नेशनल अवार्ड वापस लेने की मांग केंद्र सरकार से की गई है। इरफान से माफी मांगने को कहा गया है। जबकि कुछ अन्य मुसलमानों का कहना है कि अभी इरफान का बयान स्पष्ट नहीं है। इसलिए बयान को समझने की जरूरत है।
दरअसल, इरफान ने कहा है कि बकरीद में कुर्बानी के लिए बाजार से दो बकरों को खरीदकर उनकी कुर्बानी कराने का कोई मतलब नहीं है। कुर्बानी का मकसद अल्लाह की राह में अपनी सबसे प्यारी चीज कुर्बान करने से है। कुर्बानी के नाम पर व्यवसायीकरण हो रहा है। इरफान ने कहा कि मुहर्रम गम का महीना है लेकिन उसे सर्कस जैसा बना दिया गया है। मुसलमानों को दहशतगर्दी के खिलाफ आवाज बुलंद करनी चाहिए। इस मसले पर शिया बुद्धिजीवी डॉ. मजहर अब्बास नकवी ने कहा कि इरफान का मुहर्रम को सर्कस बताना निंदनीय है। मुहर्रम हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मनाया जाता है। कर्बला की लड़ाई ही इस्लाम में दहशतगर्दी के खिलाफ थी। इसलिए इरफान को माफी मांगनी चाहिए। शहरकाजी मौलाना आलम रजा नूरी ने कहा है कि इरफान खान का बयान उनके सामने मुकम्मल नहीं है। हालांकि कुर्बानी हर संपन्न मुसलमान पर जरूरी है। कुर्बानी के खिलाफ बोलना गलत है।
वहीं, दादामियां खानकाह के नायब सज्जादानशीन सैयद अबुल बरकात नजमी ने कहा है कि इरफान खान का बयान समझने लायक है। यह सच है कि कुर्बानी अपनी सबसे प्यारी चीज की करनी चाहिए। अब बकरीद में महंगे से महंगे बकरे खरीदकर बाजार में टहलाकर शोहरत के लिए कुर्बानी कराई जा रही है। व्यवसायीकरण की बात सही है। मुहर्रम इमाम हुसैन और 72 साथियों की शहादत की याद में मनाया जाता है। इन दिनों ढोल ताशे बजाकर, मुंह से आग निकालने और कर्तब दिखाकर मुहर्रम मनाया जा रहा है। यह नाजायज है।
मुहर्रम में इमाम हुसैन की शहादत याद कर गरीबों की अधिक से अधिक मदद कर उन्हें श्रद्धांजलि देनी चाहिए। दहशतगर्दी के खिलाफ इस्लाम हमेशा रहा है। एक बेगुनाह का कत्ल पूरी इंसानियत के कत्ल के बराबर संज्ञा देने की बात पैगंबर-ए-इस्लाम ने कही है।