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International women's Day: माहौल ने पढ़ाई में रोड़े अटकाए, शाजिया ने 133 देशों तक पंख फैलाए

Tue, 08 Mar 2022 10:02 AM IST
शिखा पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

27 साल की शाजिया का संगठन डॉ. शाजिया इंटरनेशनल ग्लोबल यूनिटी फाउंडेशन 133 देशों में फैला है। यह संगठन 33 अन्य संगठनों के साथ संयुक्त प्रोटोकॉल रखता है।
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डॉ. शाजिया तशनेम सिद्दीक - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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घर का माहौल ऐसा था कि महिलाओं का बाहर निकलना गलत माना जाता था। किसी तरह मदरसे में इंटर तक की पढ़ाई की छूट दी गई। आसपास के माहौल को देखते हुए फिर पिता आगे पढ़ाना नहीं चाहते थे। इस पर हार न मानी, बच्चों को पढ़ाकर पैसे कमाए और खुद उच्च शिक्षा हासिल की। अब यह बेटी 133 देशों में महिलाओं को सशक्त करने का काम कर रही है। हम बात कर रहे हैं कानपुर के बाबूपुरवा में रहने वाली शाजिया तशनेम सिद्दीकी की।
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27 साल की शाजिया का संगठन डॉ. शाजिया इंटरनेशनल ग्लोबल यूनिटी फाउंडेशन 133 देशों में फैला है। यह संगठन 33 अन्य संगठनों के साथ संयुक्त प्रोटोकॉल रखता है। फाउंडेशन के तहत महिलाओं को शिक्षित करने से रोजगार दिलाने तक का काम किया जाता है।

अभी तक शाजिया साढ़े तीन सौ से ज्यादा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय अवार्ड जीत चुकी हैं। इराक बसरा सिंडिकेट समेत कई संस्थानों ने उन्हें 35 डॉक्टरेट की उपाधि दी है। वह वैश्विक राजदूत एवं मानवाधिकार कार्यकर्ता और उद्यमी हैं। वह विश्व बैंक, यूनाइटेड नेशन, अमेरिकन इंटरनेशनल फेडरेशन, प्रेसीडेंशियल सर्विस सेंटर समेत विभिन्न वैश्विक संस्थानों से जुड़ी हैं।
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शाजिया बताती हैं कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए लंबा और सख्त संघर्ष करना पड़ा। पिता मो. वसीम बाबूरपुरवा के नयापुल क्षेत्र में ढाबा चलाते हैं। बचपन में मुझे घर के कामों में लगा दिया गया था। पढ़ाई रुकता देख बच्चों को ट्यूशन पढ़ाया।

सिस्टम से लड़-भिड़कर सीएसजेएमयू से बीए, फिर एमए कर लिया। कैंब्रिज विश्वविद्यालय से बिजनेस डिप्लोमा में प्रवेश तो ले लिया लेकिन एमबीए पूरा नहीं कर पाई। ग्रेजुएशन करते वक्त राज्य सरकार से मिले लैपटॉप और कीपैड फोन की मदद से प्लेसलेंट एजेंसी शुरू कर दी और फिर लगातार संघर्ष के बल पर आगे बढ़ती चली गई। डॉ. शाजिया कहती हैं कि बिना परिवार के सहयोग और आर्थिक स्थिति ठीक न होने पर समाज और घरवालों के विरोध का सामना करना पड़ता है लेकिन बाद में वे ही आपके कार्यों का सम्मान करने लगते हैं।

कुरीतियों की दीवारें दरकाकर नई रोशनी लाने में जुटीं माधवी
जेके कॉलोनी में रहने वाली माधवी सेंगर बीते कई सालों से कुरीतियों की दीवारें दरकाने के साथ ही समाज को नई रोशनी दिखाने में जुटी हैं। कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं। बेटियों को खोया हुआ सम्मान दिलाने के लिए रैलियों, सभाओं, संगोष्ठी और नुक्कड़ नाटकों के जरिये समाज को जागरूक करने के साथ ही वह सड़क पर खुद भी आंदोलन का परचम लहरा रही हैं। 

माधवी का विवाह मनोज सेंगर से हुआ था। यह अंतरजातीय विवाह रहा है। इस दंपती ने विवाह के बाद एक अनूठा प्रण लिया कि आजीवन निसंतान रहेंगे। दुनिया के बच्चों को अपने बच्चे समझेंगे। कन्या भ्रूण हत्या को रोकने के लिए वर्ष 2010 में उन्होंने विवाह में आठवें वचन की शुरुआत करवाई।
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इसमें दंपती यह वचन लेता है कि कन्या भ्रूण हत्या जैसा जघन्य अपराध नहीं करेंगे। अब तक पांच सौ से अधिक विवाहों में यह वचन लिया जा चुका है। वर्ष 2011 में उन्होंने महिलाओं के हाथों तर्पण व श्राद्ध कराने की पहली की। वह युग दधीचि देहदान और नेत्रदान अभियान की सह संयोजक हैं।

अभी तक कई पार्थिव शरीर अपने कांधे पर रखकर मेडिकल कॉलेज के एनाटमी विभाग तक वह पहुंचा चुकी हैं। सेंगर दंपती गायत्री परिवार से जुड़े हुए हैं। माधवी का कहना है कि सेवा का स्पष्ट लक्ष्य लेकर चलने वालों के लिए सहयोग की कमी नहीं होती। बिना किसी प्रतिदान की कामना के सेवा कर पाएं, यही लक्ष्य है।
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