आज के दौर में भी महिलाओं के लिए घर के बाहर हर कदम पर संघर्ष है, लेकिन इससे जूझना- लड़ना ही जिंदगी है। गृहणी से पत्थर घिसाई कारीगर बनीं यादव नगर रामादेवी की सुमन ने पति रमेश के निधन के बाद परिवार चलाने के लिए यह काम संभाला लिया।
दो श्रमिक सहयोगियों के साथ वह इस काम को कर रही हैं। सुमन ने बताया कि शुरुआत में अनुभव ना होने कारण नुकसान उठाना पड़ा। इस काम में अधिकतर पुरुष हैं। महिला होने के नाते दिक्कत होती है। अच्छे लोगों का सहयोग मिलता है तो कई बार ऐसे लोग मिलते हैं कि पैसे छोड़ने पड़ जाते हैं।
लेकिन कभी भी हार नहीं मानी और आज भी पूरे हिम्मत के साथ इस काम को कर रही हूं। खुद में एक आत्मविश्वास आया है और काफी मनोबल बड़ा है। कोई महिला मजबूरी में ही घर की दहलीज लांगती है लेकिन इसको कोई कभी ये ना माने की एक महिला कमजोर होती है।