2022 में देश के पहले मानवयुक्त स्वदेशी अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ को ग्रीन जेल ईंधन से भेजने की दिशा में आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने ऐतिहासिक शोध किया है। इंस्टीट्यूट के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग के सीनियर प्रोफेसर डीपी मिश्रा ने अपनी टीम के साथ ग्रीन जेल ईंधन बनाने में सफलता हासिल कर ली है। इसका वैज्ञानिकों ने सफल परीक्षण भी कर लिया है।
अब इसे इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन (इसरो) को सौंपा गया है। इसरो इस ग्रीन जेल ईंधन का परीक्षण करेगा। सब कुछ सही रहा तो इसी ईंधन से भारत अपने इस मिशन को अंजाम देने में कामयाब होगा।
प्रो. डीपी मिश्रा ने बताया कि इस ग्रीन जेल ईंधन से अंतरिक्ष यान दोगुनी रफ्तार से उड़ेगा। यही नहीं मौजूदा ईंधन की तुलना में इससे 30 से 40 प्रतिशत कम प्रदूषण भी होगा। इस जेल को तैयार करने में दो साल का समय लगा। प्रो. मिश्रा ने बताया कि स्पेस शटल पर अधिक दबाव के बावजूद जेल ईंधन इंजन का तापमान सामान्य अवस्था में रखने का काम करेगा।
पीएम मोदी ने किया था एलान
15 अगस्त 2018 को स्वतंत्रता दिवस पर भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया था कि भारत अपने पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन गगनयान को 2022 तक साकार कर दिखाएगा। इसके बाद इसरो के अध्यक्ष डॉ. के सिवन ने इसे एक बड़ी जिम्मेदारी और चुनौती बताई थी। उन्होंने कहा था कि इसे समय पर पूरा किया जाएगा। यह कार्यक्रम भारत को मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन शुरू करने वाला दुनिया का चौथा देश बना देगा। अब तक सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन ने मानव अंतरिक्ष यान मिशन में सफलता पाई है।
दो साल पहले इसरो ने दिया था प्रोजेक्ट
प्रो. डीपी मिश्रा ने बताया कि इसरो ने दो साल पहले यह प्रोजेक्ट आईआईटी को दिया था। ग्रीन जेल ईंधन तैयार करने के बाद इसका परीक्षण किया गया और सफलता मिलने पर इस शोध को ‘फ्यूल’ रिसर्च जनरल में प्रकाशित भी किया गया। तकनीक को पेटेंट कराने के बाद इसरो को इसकी रिपोर्ट भेज दी गई है।
अभी इस तरह के ईंधन का अंतरिक्ष यान में होता है प्रयोग
प्रो. डीपी मिश्रा ने बताया कि ग्रीन जेल को केरोसिन और जेलिंग एजेंट के साथ मिलाकर तैयार किया गया है। अभी स्पेस शटल उड़ाने के लिए लिक्विड हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, पैरा ऑक्साइड, नाइट्रोजन टेट्रा ऑक्साइड प्रोपेलेंट का इस्तेमाल हो रहा है। कई बार अंतरिक्ष यान पर अधिक दबाव से लिक्विड ईंधन लीक हो जाता है। इससे शटल के फटने का खतरा बढ़ जाता है। वहीं नया ईंधन जेल के रूप में है। शटल पर अधिक दबाव के दौरान भी यह स्थिर रहता है। इंजन का तापमान कम रखने में भी सहायता करेगा। इससे ईंधन लीकेज या शटल फटने की आशंका नहीं रहेगी।
सुपर एनर्जेटिक प्रोपेलेंट वर्जन पर शोध जारी
प्रो. मिश्रा के मुताबिक अब मेटल और नैनो मैटेरियल का इस्तेमाल कर ग्रीन जेल के ‘सुपर एनर्जेटिक प्रोपेलेंट’ वर्जन पर भी शोध चल रहा है। अगर इसमें सफलता मिलती है तो ग्रीन जेल का प्रयोग सेटेलाइट लांचिंग व्हीकल में भी किया जा सकेगा।