बिठूर में नानाराव पेशवा स्मारक पार्क स्थित म्यूजियम में रखे अंग्रेजों के जमाने के शस्त्र
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कानपुर। महानगर और इसके आसपास आदिकालीन धरोहरों का ऐसा खजाना मौजूद है, जो किसी भी पर्यटन स्थल से कम नहीं है। इनमें से ज्यादातर धरोहर पुरातत्व विभाग की देखरेख में हैं, लेकिन इन स्थलों पर पानी, बिजली जैसी बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं होने की वजह से थोड़ी दिक्कत है। वैसे दिन के समय यहां आकर धरोहरों की नक्काशी देखने का अलग ही मजा है। इसलिए जब अगली बार घूमने की योजना बनाएं तो एक दिन इन 300 साल पुरानी इमारतों के बीच जरूर गुजारें।
भीतरगांव में है गुप्तकालीन मंदिर
कसबा भीतरगांव में ईंटों से निर्मित गुप्तकालीन मंदिर है। उत्तर प्रदेश के इतिहास में इसका उल्लेख है। मंदिर के गर्भगृह में किसी देवी-देवता की मूर्ति नहीं है। मंदिर की खोज 6वीं सदी के आसपास अंग्रेज पर्यटक एलेक्जेंडर कनिंघम ने की थी। वर्ष 1908-09 में इसको संरक्षित करने के प्रयास शुरू किए गए।
चंदेल राजाओं ने बनवाया था शिव मंदिर
घाटमपुर मुगल रोड के किनारे स्थित निबियाखेड़ा गांव में 9 वीं सदी में चंदेल राजाओं का बनवाया भद्रेश्वर महादेव का विशाल मंदिर है। यह मंदिर ईंटों से निर्मित है और पुरातत्व विभाग के अधीन है।
पिसहनरी बुढ़िया का मठ घाटमपुर में
कसबा घाटमपुर में हमीपुर रोड के ठीक किनारे ककइया ईंटों से निर्मित प्राचीन मंदिर का निर्माण तकरीबन 5 सौ वर्ष पूर्व दो बहनों ने करवाया था। जो लोगों के घरों में हाथ चक्की से आटा पीसती थीं। लोग मंदिर को पिसनहरी बुढ़िया के मंदिर (मठ) के नाम से जानते हैं।