पिछले डेढ़ महीने से कटरी के लोगों और वन-जंतु अधिकारियों की नाक में दम करने वाला बाघ नहीं बल्कि बाघिन है। वाइल्ड लाइफ ऑफ इंडिया के डॉ सौरभ संघई ने बताया कि दो दिन पहले कैमरे में इसकी फोटो कैद होने के बाद यह पता चला कि ये बाघिन है।
यही वजह रही कि हम लोगों ने उसे बाघ समझ कर जब फंसाने के लिए बाघिन के मूत्र का छिड़काव किया था तो वह हमारे जाल में नहीं फंसा था। बाघ होता तो जरूर उस क्षेत्र में चहलकदमी करता जहां मूत्र का छिड़काव किया गया था।
वहीं, शुक्रवार रात को बाघिन ने न तो जिंदा और न ही मरे हुए पड़वे को खाया।
दुधवा नेशनल पार्क से करीब तीन महीने पहले यह बाघिन भटककर लखीमपुर, सीतापुर, मिश्रिख हरदोई, लखनऊ, उन्नाव होते हुए गंगा कटरी में आ गई है। वन विभाग और वाइल्ड लाइफ वाले तबसे उसे पकड़ने की कोशिश में लगे हैं।
डॉ. संघई ने बताया कि शुक्रवार रात को भी बाघिन ने कटरी में खूब चहलकदमी की है। पहाड़ीपुर से लेकर कन्हवापुर तक उसके पंजों के निशान मिले हैं। पहाड़ीपुर से लेकर कन्हवापुर के बीच की नदी को भी बाघिन ने पार किया है।
इसके अलावा बांधे गए पड़वे को भी उसने नहीं खाया है। डॉ. संघई ने बताया कि बाघिन जिंदा पड़वा के आस-पास भी टहलती रही लेकिन उसे खाया नहीं। इसका मतलब उसका पेट भरा है।
उन्होंने कहा कि बाघ, बब्बर शेर की खास बात होती है कि जब तक उसका पेट भरा है या बचा हुआ मांस खाने लायक है, तब तक वह नया शिकार नहीं करता। उन्होंने कहा कि अब शनिवार की रात को अगर बाघिन शिकार करती है तो रविवार रात उसका खाना पिंजड़े में रखा जाएगा ताकि वह खाने के लिए पिंजड़े में आए और पकड़ी जाए।