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हिंदी पत्रकारिता दिवस विशेष: जानिए उन पत्रकारों और अखबारों के बारे में जिनसे हिल गयी ब्रिटिश हुकूमत

Wed, 30 May 2018 01:23 PM IST
शिखा पाण्डेय, अमरउजाला कानपुर
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लोकतंत्र के चौथे स्तभ के वजूद की नींव 30 मई 1826 को कानपुर के पं. जुगल किशोर शुक्ल के देवनागरी में हिन्दी का पहला समाचार पत्र ‘उदंत मार्तन्ड’ से पड़ी। उस समय लगाया गया हिंदी पत्रकारिता का वटवृक्ष इतना विशाल हो जाएगा इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। 

 
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पत्रकारिता में क्रांतिकारिता का रंग गणेश शंकर विद्यार्थी जी ने भरा था। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में 9 नवंबर 1913 को ‘प्रताप’ की नींव पड़ी। यह काम शिव नारायण मिश्र, गणेश शंकर विद्यार्थी, नारायण प्रसाद अरोड़ा और कोरोनेशन प्रेस के मालिक यशोदा नंदन ने मिलकर किया था। चारों ने 100-100 रुपये की पूंजी का योगदान दिया था। 400 रुपये की रकम से चार रुपये महीने किराये के मकान से 16 पृष्ठ का ‘प्रताप’ शुरू हुआ था। पहले साल से पृष्ठों की वृद्धि का सिलसिला बढ़ा तो फिर बढ़ता ही रहा। कुछ ही दिन बाद यशोदा नंदन और नारायण प्रसाद अरोड़ा अलग हो गए। शेष शिव नारायण मिश्र और गणेश शंकर विद्यार्थी ने ‘प्रताप’ को अपनी कर्मभूमि बना लिया। विद्यार्थी जी के समाचार पत्र प्रताप से क्रांतिकारियों को काफी बल मिला। 
 

 

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कानपुर पत्रकारिता के कर्णधार 

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- गणेश शंकर विद्यार्थी जी 
- झंडा गीत के लेखक श्याम लाल गुप्त पार्षद जी 
- बाल कृष्ण शर्मा नवीन जी 
- महावीर प्रसाद द्विवेदी जी 
- हसरत मोहानी जिन्होंने साहित्य के जरिए अंग्रेजों पर चलायी कलम। 
- रमा शंकर अवस्थी, वर्तमान अखबार के संपादक । 

 





 

अंग्रेजों ने इन पत्र-पत्रिकाअों को किया था जब्त 

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भयंकर, चंद्रहास, अछूत सेवक, चित्रकूट आश्रम, लाल झंडा, वनस्पति, मजदूर ये सभी एेसी पत्र व पत्रिकाएं हैं जिन्हें अंग्रेजों ने जब्त कर जुर्माना वसूला था। 

 

 

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गणेश शंकर विद्यार्थी का कथन 

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मैं पत्रकार को सत्य का प्रहरी मानता हूं, सत्य को प्रकाशित करने के लिए वह मोमबत्ती की तरह जलता है। सत्य के साथ उसका वही नाता है, जो एक पतिव्रता नारी का अपने पति के साथ रहता है। पतिव्रता पति के साथ सती हो जाती है और पत्रकार सत्य के साथ। 

 

 

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कवि सनेही की कविता में कानपुर का महत्व 

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कवि सम्राट सनेही ने कानपुर का पानी नामक एक कविता लिखी थी। लव कुश अश्व बांधकर बिना सेना लड़े, लंका जीती बाप से भी हार नहीं मानी है। भूषण की बानी ने चढ़ाया एेसा पानी, चमकी भवानी भक्त शिवा की भवानी है। पहले स्वतंत्रता समर में सनेही यहीं नाना राव से मिले, मरी फिरंगियों की नानी हैं। नाम सुनते ही, हैं पकड़ते विपक्षी कान, यह कानपुर है यहां का कड़ा पानी है। 

 

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20वीं शताब्दी के अखबार

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19वीं शताब्दी के अंत और 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में हिन्दी के अनेक दैनिक समाचार पत्र निकले जिनमें हिन्दुस्तान, भारतोदय, भारतमित्र, भारत जीवन,  अभ्युदय, विश्वमित्र,  आज, प्रताप, विजय, अर्जुन आदि प्रमुख हैं। 20वीं शताब्दी के चौथे-पांचवे दशकों में हिन्दुस्तान, आर्यावर्त, नवभारत टाइम्स, नई दुनिया, जागरण, अमर उजाला, पंजाब केसरी,  नव भारत आदि प्रमुख हिन्दी दैनिक सामने आए। 

 

यह भी जानें 

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- पूरे भारत में कानपुर की पत्रकारिता इतनी प्रखर रही है कि इस शहर को संपादकों की टकशाल कहा जाता था। 
- पूरे देश में शायद ही एेसा कोई बड़ा अखबार होगा जिसमें कानपुर के पत्रकार शामिल न हों। 
- हिंदी पत्रकारिता के पहले संपादक कानपुर निवासी जुगल किशोर शुक्ल ने कलकत्ता से पहला हिंदी समाचार पत्र  उदंत मार्तन्ड प्रकाशित किया था। 
- शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कानपुर व कलकत्ता सबसे सशक्त रहा है। 

 
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राजा राममोहन राय का बंगाल गजट

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वैसे तो हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत बंगाल से हुई और इसका श्रेय राजा राममोहन राय को दिया जाता है। राजा राममोहन राय ने ही सबसे पहले प्रेस को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ा और भारतीयों के सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक, आर्थिक हितों का समर्थन किया। उन्होंने समाज में व्याप्त अंधविश्वास और कुरीतियों पर प्रहार किए और अपने पत्रों के जरिए जनता में जागरूकता पैदा की। राम मोहन राय ने कई पत्र शुरू किए जिसमें साल 1816 में प्रकाशित बंगाल गजट अहम है, जो भारतीय भाषा का पहला समाचार पत्र था। लेकिन 30 मई 1826 को कलकत्ता से प्रकाशित 'उदन्त मार्तण्ड' हिन्दी भाषा का पहला समाचार पत्र माना जाता है। 
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