कानपुर। शहर में सट्टा गिरोह के भंडाफोड़ के बाद चौंकाने वाले खुलासे हुए। गिरोह का सरगना मनीष उर्फ प्रोफेसर सुनियोजित तरीके से इस नेटवर्क को संचालित कर रहा था। वह गिरोह के लिए काम करने वाले युवकों को 13 से 20 हजार रुपये तक मासिक वेतन देता था। पुलिस की दबिश में किदवईनगर स्थित उसके ठिकाने से भारी मात्रा में नकदी, मशीनें और अन्य सामग्री बरामद की गई हैं।
पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने बताया कि गिरफ्तार कार्तिक की दादानगर में बटर पेपर की फैक्ट्री है। वह दो साल से सट्टे के अवैध धंधे से जुड़ा है। कार्तिक और राजकुमार ने बैटिंग एप की मास्टर आईडी पुणे के मनीष उर्फ प्रोफेसर से ली थी। दोनों शहर के लोगों से सट्टा लगवाते थे। कल्पेश, रवि और विष्णु कैश कैरियर का काम करते थे।
फजलगंज इंस्पेक्टर धनंजय पांडेय ने बताया कि मनीष ने करीब डेढ़ साल पहले किदवईनगर में दोमंजिला मकान 60 हजार रुपये प्रतिमाह किराये पर लिया था। मकान के अंदर बैठकर ऑनलाइन एप के जरिये आईपीएल के मैचों पर दांव लगवाए जाते थे और हिसाब-किताब रखा जाता था। छापे के दौरान पुलिस टीम जब अंदर पहुंची तो एक कमरे में फर्श पर चटाई बिछी थी। उस पर 200 और 500 रुपये के नोटों के बंडल करीने से रखे थे। कमरे के एक कोने में नोट गिनने के लिए तीन मशीनें रखी थी। नकली नोटों की पहचान के लिए करेंसी चेकिंग मशीन भी मिली, जिससे गिरोह नकली नोटों के जोखिम से बचता था। पूछताछ में कार्तिक ने बताया कि मशीनों को सरगना मनीष ने करीब सवा लाख रुपये में दिल्ली से खरीदा था। पुलिस के अनुसार गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और शहर के कई इलाकों में इसका नेटवर्क फैला हुआ है।