टूटे-फूटे किराए के मकान और भीषण गंदगी में जीवन बिताते हुए स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित उमाशंकर अवस्थी ने शुक्रवार शाम 7.15 बजे अंतिम सांस ली। वे 95 साल के थे। अपने पीछे वह एक बेटा, एक बेटी और दो पोतियों को छोड़ गए हैं।
शनिवार को भैरव घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया जाएगा। उमाशंकर अवस्थी का जन्म घाटमपुर के पास कठारा गांव में 1920 को हुआ था। इनके पिता श्याम सुंदर अवस्थी किसान थे। मां सुंदरा देवी गृहिणी थीं।
जब वे चार साल के थे तब उनके पिता की मौत हो गई थी। इसके बाद इनकी परवरिश चाचा बिंदा प्रसाद ने की। 1941-42 में चाचा का बेटा अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे आंदोलन में जेल गया था लेकिन अंग्रेजों से माफी मांग कर जेल से बाहर आ गया था।
लोगों ने इसे मजाक बना दिया तो चाचा आहत हो गये। उमाशंकर से यह देखा नहीं गया। देश प्रेम तो उनमें पहले से ही उछाल मार रहा था, सो वे आजादी के आंदोलन में कूद पड़े और 1942 के आंदोलन में 10 महीने जेल में काटे।
देश आजाद हुआ तो शहर में जरीब चौकी स्थित द्वारिकापुरी में आकर बस गये। फिर परिवार का पेट पालने के लिए मुंबई चले गये। लौटे तो सरकारी पेंशन मिलने लगी, लेकिन दूसरा कोई जरिया नहीं बना। पेंशन से परिवार का गुजारा चलाना पड़ा।
बेटे दिनेश कुमार अवस्थी ने बताया कि 29 सितंबर 2014 को एक आदेश के बाद पिता का एकाउंट एसबीआई से बदलकर पीएनबी में हो गया था।
इसके बाद से उनके खाते में केंद्र की ओर से आने वाली करीब 22 हजार और प्रदेश सरकार से मिलने वाली 8 हजार रुपये पेंशन नहीं आ रही थी। जिसको लेकर वे परेशान थे। दो दिन पहले ही डीएम से मिलने गए थे।
द्वारिकापुरी बाजार स्थित कैलाशनाथ गर्ग के हाते में खपरैल से बने जर्जर मकान में जैसे-तैसे दिन काट रहे थे। अपने इकलौते व बेरोजगार बेटे और दो बिन ब्याही पोतियों की शिक्षा और विवाह की चिंता उन्हें खाये जा रही थी।
इसके अलावा 65 साल की बेटी कमलावती के पालन-पोषण की जिम्मेदारी भी उन्हीं के ऊपर थी। परिजनों ने बताया कि आजादी के लिए जी-जान से लड़ने वाले उमाशंकर अवस्थी की कहीं कोई सुनवाई नहीं थी।
बीमार और बिन मां की उनकी पोती का एडमीशन तक नहीं हो सका था। यही नहीं बरसात में गंदा पानी घर के भीतर तक भर जाता है। पूरा खपरैल टपकता है। नगर निगम में कई बार शिकायत करने के बाद भी बूढ़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी की कोई सुनवाई नहीं हुई।