केंद्र सरकार की ओर से हज नियमावली में बदलाव कर बिना महरम (वह मर्द जिनसे पर्दा न हो) के महिलाओं को हज पर जाने की अनुमति का लोगों ने लाभ उठाना भी शुरू कर दिया है। कानपुर शहर की चार महिलाओं ने एक समूह बनाकर आवेदन किया है। हालांकि यह सभी एक दूसरे की न तो रिश्तेदार हैं और न ही एक दूसरे से कभी मिली हैं। शर्त थी कि चार महिलाएं एक समूह बनाकर बिना मर्द के हज करने सऊदी अरब जा सकती हैं। इसका उलेमा ने विरोध भी किया है लेकिन इन महिलाओं को यह नहीं मालूम है। उनका कहना है कि अगर इसमें कुछ गलत होता तोे सऊदी अरब सरकार इस नियम को स्वीकार ही न करती।
बिना जान-पहचान साथ में किया आवेदन
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कानपुर के पटकापुर (चटाई मोहाल) की रहने वाली अख्तर जहां, बाबूपुरवा की मसर्रत जहां, परमपुरवा की महरुन निशा और दादामियां चौराहा की शमीम बानो हज करने जा रही हैं। इन महिलाओं ने सुना था कि इस बार सरकार ने बिना मर्द के महिलाओं को हज पर जाने की अनुमति दी है। इस पर बांसमंडी में हज फार्म भराने वाले कैंप पहुंच गईं। वहां बताया गया कि अकेले नहीं बल्कि जाने के लिए चार महिलाओं का समूह होना चाहिए, इस पर ये मायूस हुईं। हालांकि वहां बताया गया कि अगर अकेले हज पर जाने वाली चार महिलाओं के फार्म आए तो वे ग्रुप बनाकर आवेदन करा देंगे। इस तरह इनका समूह बनकर तैयार हुआ।
तीन साल से आवेदन कर रहीं, अब मिला मौका
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पटकापुर की अख्तर जहां ने बताया कि तीन बार से हज के लिए आवेदन कर रही थीं। उनके पति महबूब अली का इंतकाल चार साल पहले हो चुका है। इसलिए महरम रिश्तेदार के साथ हज जाने की खुशामद कर रही थीं लेकिन लॉटरी में नाम ही नहीं आ रहा था। इस बार उनकी बेटी शबाना ने सुना कि अकेले हज पर जा सकती हैं तो आवेदन करने चली गईं। वहां तीन अन्य महिलाओं का भी साथ मिल गया। वे कहती हैं कि 15 सालों से हज करने के लिए रुपये जुटा रही थीं। अब अल्लाहताला ने मौका भी दे दिया है। उन्हें यह नहीं मालूम कि कुछ लोग इसका विरोध भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि अगर ऐसा होता तो सऊदी अरब हुकूमत इस तरह के हज यात्रियों और आवेदन को स्वीकार क्यों करती। उनके दो बेटे सऊदी अरब में ही नौकरी करते हैं और वे एक बेटे और बहू व बच्चों के साथ घर में रहती हैं।
नया नियम न होता तो बेटे के साथ जाती
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परमपुरवा की रहने वाली महरुन निशा पांच साल पहले पति के साथ हज पर जाना चाहती थीं लेकिन उनका पासपोर्ट समय से नहीं बन सका। इससे उनके पति मजीद अली हज करने चले गए। हज करके लौटने के कुछ महीने बाद उनका निधन हो गया। इसके बाद वह अपने बेटे रईस अली के साथ हज पर जाना चाहती थीं लेकिन रईस के बच्चे छोटे होने की वजह से वह कुछ साल रुकना चाहते थे। हालांकि उनकी उम्र बढ़ रही थी, इसलिए वह चाहती थीं कि हज पर चली जाएं। केंद्र सरकार की नई हज नियमावली में उन्हें यह मौका मिला और ऐसी चार महिलाओं के मिलने से एक समूह बन गया। अब चयन लॉटरी से होना है लेकिन उन्हें उम्मीद है कि अल्लाहताला उन्हें मौका देंगे।
बस दुआ है कि लॉटरी में नाम आ जाए
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बाबूपुरवा की मसर्रत बेगम ने भी हज यात्रा के लिए आवेदन किया है। उनके पति मोहम्मद वसीम सऊदी अरब में नौकरी करते हैं। वह कई सालों से हज पर जाना चाहती थीं लेकिन हज के मौके पर उनके पति को छुट्टी नहीं मिलती है और वह अकेले हज पर जा नहीं सकती थीं। ऐसे में नई हज नीति में मिले मौके पर उन्होंने आवेदन कर दिया और समूह बनने पर हज आवेदन स्वीकार हो गया। उनका कहना है कि वह अल्लाहताला से दुआ कर रही हैं कि उन्हें हज पर जाने का मौका मिल जाए।
शरीअत नहीं देती इजाजत- मुफ्ती इनामउल्ला
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शरई अदालत दारुल कजा के काजी मुफ्ती इनामउल्ला कासमी का कहना है कि सरकार भले ही महिलाओं को अकेले हज करने की इजाजत दे दे लेकिन शरीअत इसकी अनुमति नहीं देती है। चाहे जितनी भी महिलाएं हों, समूह में भी बिना महरम (वह मर्द जिनसे पर्दा न हो और शादी नहीं हो सकती) के हज पर नहीं जा सकती हैं। यह फैसला शरीअत में दखल है।
यह पहला मौका है, जिसमें सरकार के निर्देश पर हज कमेटी ने समूह में बिना मर्द के महिलाओं के हज पर जाने की अनुमति दी है
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यह पहला मौका है, जिसमें सरकार के निर्देश पर हज कमेटी ने समूह में बिना मर्द के महिलाओं के हज पर जाने की अनुमति दी है। ऐसी महिलाएं हज पर जा सकती हैं। अगर वह और उनके परिजन इस नियम से संतुष्ट हों तो यह उनका फैसला है।
- हाजी शारिक अल्वी, मास्टर हज ट्रेनर, राज्य हज समिति