लीन मैन्यूफैक्चरिंग का इस्तेमाल करने में शहर के उद्यमी पीछे हैं, जबकि शहर एमएसएमई का गढ़ है। जापान, चीन, ताईवान, सिंगापुर, अमेरिका जैसे देश इसका उपयोग करके गुणवत्ता युक्त प्रतिस्पर्धी और सस्ते उत्पाद बना रहे हैं।
मर्चेंट चेंबर में शुक्रवार को हुई प्रेसवार्ता में यह जानकारी राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद के निदेशक रामेश्वर दुबे ने दी। उन्होंने बताया कि उद्योगों में लीन मैन्यूफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के साथ ही साथ इंजीनियरिंग व अन्य कॉलेजों के छात्रों को उद्यमिता के लिए प्रेरित करने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जाएगा।
उन्होंने बताया कि लीन मैन्यूफैक्चरिंग स्कीम को केंद्र सरकार ने पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 2009 से 2013 तक चलाया था। अब इसे 2017 तक बढ़ा दिया गया है। इसके तहत 350 क्लस्टर बनाए जाने हैं।
एक क्लस्टर बनाने के लिए भारत सरकार 36 लाख रुपये कंसल्टेंसी शुल्क देती है। उन्होंने बताया कि काउंसिल 18 फरवरी तक राष्ट्रीय उत्पादकता सप्ताह मनाएगा। 15 और 16 फरवरी को एलेन हाउस में निबंध प्रतियोगिता, 16 को पद्मपत सिंहानिया इंस्टीट्यूट में वाद-विवाद, 17 को एचबीटीआई में व्याख्यान होगा।
इस मौके पर मर्चेंट चेंबर के अध्यक्ष डॉ. इंद्रमोहन रोहतगी, एके सिन्हा, राजेश कुमार, सीए अंकुर श्रीवास्तव, राजेश कुमार आदि मौजूद रहे।
क्या है लीन मैन्यूफैक्चरिंग
लीन मैन्यूफैक्चरिंग एक तरह से कंसल्टेंसी है। यदि आप इसकी सेवा लेना चाहते हैं तो इसके लिए सर्वोदय नगर स्थित कबीर भवन में एमएसएमई के कार्यालय में आवेदन करना होगा।
इसके बाद विभाग की ओर से छह से 10 लोगों का क्लस्टर बनेगा। इसमें आने वाले खर्च का 20 प्रतिशत उद्यमी को देना होगा, बाकी केंद्र सरकार वहन करेगी। यह पैनल आपकी इकाई में जाकर कम खर्च पर अच्छे उत्पाद बनाने की संभावना तलाशेगी। प्रशिक्षण के साथ ही सलाह भी देगी।