चुनाव प्रचार धीरे-धीरे समाप्ति की ओर है, पर अभी भी साउंड रिकॉर्डिंग स्टूडियोज में चहल-पहल है। प्रत्याशियों की कोशिश है कि नए-नए नारे गढ़कर उन्हें गीत के रूप में पेश कर लोगों तक पहुंचाकर छाप छोड़ी जाए।
गीत ‘बेबी को बेस पसंद है’ की तर्ज पर सपा-कांग्रेस का ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ और बसपा का ‘सिंहासन पर माया बहन’ और भाजपा का ‘इस बार बीजेपी, एक बार बीजेपी’ की धूम है वहीं लोकल स्तर पर भी प्रत्याशी गानों से प्रचार करने में जुटे हैं।
हर्षनगर स्थित ऑउट ऑफ द बॉक्स मोशन पिक्चर्स कंपनी में म्यूजिक डॉयरेक्टर, कंपोजर मात्र 14 वर्षीय मधुरम खरे व रिकॉर्डिस्ट राहुल बक्सारिया ने बताया कि चुनाव के समय काफी कुछ नया करने को मिला है। सीखने के साथ रुपये भी मिल जाते हैं।
काकादेव स्थित डिजीट्रैक साउंड कंपनी के मालिक सुमंत ने बताया कि उन्होंने चुनाव के समय में दो से तीन गाने रिकॉर्ड किए हैं। इसके अलावा नेहरू नगर स्थित ओम म्यूजिक रिकॉर्डिंग स्टूडियो, किदवई नगर स्थित कॉलीवुड एकेडमी, वर्ल्ड बैंक बर्रा स्थित नंदरानी कला एकेडमी, पर्ल लैब आदि साउंड रिकॉर्डिंग स्टूडियो हैं।
10 से 20 हजार रुपये में बनता है एक गाना
साउंड स्टूडियोज की मानेें तो एक नया गाना 10 हजार से 20 हजार रुपये तक में रिकॉर्ड होता है। इसमें म्यूजिक और धुन सब कुछ नया होता है। गाने की क्वालिटी के हिसाब से रुपये तय होते हैं। वहीं, किसी बॉलीवुड म्यूजिक की थीम पर वॉइस ओवर करके 5 हजार से 8 हजार में भी गाना रिकॉर्ड हो जाता है। इसमें म्यूजिक नहीं देना पड़ता कैराओके सॉफ्टवेयर से केवल म्यूजिक डॉउनलोड करके आवाज देनी पड़ती है।
सिंगिग सीख रहे युवाओं के लिए सुनहरा मौका
साउंड रिकॉर्डिंग स्टूडियोज के संपर्क में ऐसे कई युवा होते हैं जो सिंगिंग सीख रहे होते हैं। ऐसे में चुनाव के समय में उनके लिए सुनहरा मौका होता है। उनका गाया हुआ गाना जब गलियों में बजता है, तो उनके अंदर कांफिडेंस तो आता ही है और वह कुछ रुपये भी कमा लेते हैं।
गानों का होता है साइकोलॉजिकल इफेक्ट
एक तरह से चुनावों में गानों का साइकोलॉजिकल इफेक्ट पड़ता है। जब लोग खासकर बच्चे कोई गाना बार-बार सुनते हैं तो वह उसे गुनगुनाते भी हैं। इससे उसका प्रचार हर जगह पहुंचता है। लोग उस प्रत्याशी के बारे में दो-चार बातें कर ही लेते हैं, जिसका फायदा प्रत्याशी को मिल सकता है।