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हिंदी में डब्बा गोल देख चल जाता था सोंटा, यूपी बोर्ड परीक्षा में आठ लाख विद्यार्थी इस विषय में हुए फेल

Mon, 20 Jul 2020 12:56 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा शांतनु त्रिपाठी, अमर उजाला, कानपुर
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : iStock
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यूपी बोर्ड परीक्षा में आठ लाख विद्यार्थियों का हिंदी में फेल होना मातृभाषा के तिरस्कार को साबित करने के लिए काफी है। कानपुर में भी तमाम विद्यार्थियों का हिंदी में डब्बा गोल हुआ है, जबकि इस धरती ने कई ऐसे सपूतों को जन्म दिया है, जिन्होंने हिंदी को न सिर्फ समृद्ध किया, बल्कि परिष्कृत भी। उनमें सबसे ऊपर नाम आता है आचार्य किशोरीदास दास वाजपेयी का, जिन्हें हिंदी का पाणिनि कहा जाता है। अशुद्ध हिंदी बोलने पर वे सोंटा चला देते थे।
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व्याकरणाचार्य किशोरीदास वाजपेयी का जन्म सन् 1898 में मंधना के रामनगर गांव में हुआ था। आचार्य किशोरीदास वाजपेयी हिंदी के परिष्कार के प्रति सदैव प्रयत्नशील रहे। हिंदी शब्दानुशासन और हिंदी शब्द मीमांसा पुस्तक लिखने की पीछे उनकी मंशा ही यह थी कि भाषा की शुद्धि बनी रहे। खड़ी बोली हिंदी का व्याकरण उत्पन्न करने में उनका योगदान अप्रतिम है।
पाठन न होने से पतन

डीबीएस कॉलेज में हिंदी के शिक्षक रहे और ललित निबंधकार डॉ. शिवकुमार दीक्षित के अनुसार उत्तीर्ण होने के लिए अभीष्ट अंक प्राप्त कर लेना अनुत्तीर्ण होने जैसा है। कक्षाओं में पाठन कराने की परंपरा खत्म हो गई, जिससे यह दशा हुई है। हिंदी में अनुत्तीर्ण होने के पीछे बच्चों से ज्यादा अभिभावक जिम्मेदार हैं। मातृभाषा की उपेक्षा चिंता का विषय है।
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हिंदी की उपेक्षा से दुर्गति
वीएसएसडी कॉलेज में हिंदी संकाय के प्रमुख डॉ. पंकज चतुर्वेदी का कहना है कि हिंदी के बारे में यह माना जाता है कि इसको क्या पढ़ना। अभियांत्रिकी, प्रबंधन या चिकित्सा विज्ञान तो अंग्रेजी में ही पढ़ना पड़ेगा। इससे हिंदी की उपेक्षा हो रही है। साथ ही नवधनाढ्य मध्य वर्ग में हिंदी को हीन और अंग्रेजी को सशक्त माना जाता है। यह भी एक कारण है कि बच्चों को हिंदी पर ध्यान देने के लिए नहीं कहा जाता। यह मामला गंभीर है।

 
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
छात्रों को हिंदी से लगाव नहीं
हरसहाय जगदंबा सहाय इंटर कॉलेज के हिंदी शिक्षक डॉ. सुधांशु त्रिपाठी के अनुसार विद्यार्थियों का हिंदी के प्रति बिल्कुल रुझान नहीं है और वे इसे बेहद सरल भी समझते हैं। यही कारण है कि इतनी बड़ी संख्या में विद्यार्थी हिंदी में फेल हो गए।

हिंदी सेवियों का पुण्य स्मरण
कानपुर के आचार्य सद्गुरुशरण अवस्थी, व्याकरणाचार्य वागीश शास्त्री ने हिंदी को समृद्ध करने के लिए पूरा प्रयत्न किया। हिंदी साहित्य में कानपुर से योगदान देने वालों की फेहरिस्त तो बहुत लंबी है।

हिंदी के लिए महात्मा गांधी के विरोध में खड़े हुए
हिंदुस्तानी यानी हिंदी-उर्दू का मिश्रण को अपनाने के लिए महात्मा गांधी जोर दे रहे थे। इस पर कानपुर के पत्रकार, लेखक वेंकटेश नारायण तिवारी ने कढ़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने इस बारे में कई पत्र भी महात्मा गांधी को लिखे थे कि इस तरह से भाषा को अशुद्ध न कराएं। जबकि वेंकटेश नारायण तिवारी महात्मा गांधी के अनन्य भक्त थे।

हिंदी में हस्ताक्षर किए तो सब आश्चर्य में पड़े
स्टेट बैंक ऑफ इंडिया से सेवानिवृत्त और केंद्रीय सचिवालय हिंदी परिषद की नगर शाखा के पूर्व सचिव रामकिशोर वाजपेयी के मुताबिक वर्ष 1965 में जब उन्होंने नौकरी चालू की थी, तो रजिस्टर पर हिंदी में हस्ताक्षर किए। इसे देख कई लोगों को आश्चर्य हुआ। कई लोगों ने पूछा भी कि हिंदी में में हस्ताक्षर क्यों किए, तो इस पर जवाब दिया कि अब देश आजाद हो गया है। उसके बाद से कई लोग हिंदी में हस्ताक्षर करने लगे। सरकारी दफ्तरों में हिंदी में कामकाज होता तो है, लेकिन अब भी अंग्रेजी का प्रभुत्व है।
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