जबकि स्वस्थ मिट्टी में जीवांश कार्बन न्यूनतम 0.8 प्रतिशत होना चाहिए । मिट्टी को पौधे का विकास करने के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटाश, आयरन, जस्ता और मैग्नीज समेत 17 तरह के पोषक तत्वों की जरूरत होती है। जो कि केंचुआ खाद से पूरे हो जाते हैं।
अगर आप रासायनिक उर्वरक का प्रयोग करते हैं। तो आपको प्रत्येक पोषक तत्व के लिए अलग-अलग खाद का प्रयोग करना पड़ेगा। किसानों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ उनको केंचुआ खाद बनाने के उपकरण निशुल्क सीएसए द्वारा मुहैया करवाए गए हैं। समय-समय पर विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक उन किसानों से मिलकर उनकी समस्याओं का समाधान करते हैं।
किसानों से बातचीत
- बिल्हौर तहसील के अकबरपुर सिंह गांव के किसान कौशल किशोर तिवारी ने बताया पिछले तीन साल से केंचुआ खाद से खेती कर रहे हैं। सीएसए ने हम लोगों को केचुआ खाद बनाने का प्रशिक्षण दिया और उपकरण निशुल्क मुहैया करवाए थे। इसके उपयोग से मिट्टी की उर्वरक क्षमता बढ़ी है।
हम सब्जियों की खेती करते हैं । पहले हमारा टमाटर और भिंडी 4 से 5 दिन के भीतर खराब हो जाता था जिस वजह से हमको जल्दी बेंचना पड़ता था। अब वही सब्जियां 10 दिन तक रखने पर खराब नहीं होती हैं। केंचुआ खाद घर में बन जाती है। जबकि रासायनिक खाद बाजार से खरीदकर लानी पड़ती थी, उसका पैसा बच जाता है।
- चौबेपुर ब्लाक के तरी पाठकपुर गांव के किसान विजय सिंह ने बताया उनके 30 बीघा खेती है, जिसमें वह सब्जियां बोते हैं। सीएसए से प्रशिक्षण मिलने के बाद वह केंचुआ खाद से सब्जियों की खेती कर रहे हैं। इसका उपयोग करने से हमारी सब्जियां 4 से 5 दिन ज्यादा रखने पर भी खराब नहीं होती है। सब्जियों को बनाकर खाने में स्वाद अच्छा होता है।
सबसे बड़ी बात रासायनिक खादों को लाने में हमारा रुपया लगता था, इसको हम घर पर ही बना लेते हैं। ट्रेनिंग के दौरान बताया गया था रासायनिक खादों से उपजी फसल से कैंसर समेत कई गंभीर रोग होते हैं । इस वजह से हमने खासकर जैविक खादों से खेती करना शुरू कर दी। सीएसए के वैज्ञानिक हमारा समय समय पर आकर मार्गदर्शन करते रहते हैं।
जैविक खादों से खेती करने पर मिट्टी की उत्पादन क्षमता बढ़ती है साथ ही खेती में पानी भी कम लगता है। 2017 में विश्व विद्यालय की एक परियोजना शुरू हुई थी, जिसके परिणाम बेहतर मिले हैं। बिल्हौर तहसील के गांव में परियोजना शुरू होने से पहले मिट्टी में जीवांश कार्बन 0.4 प्रतिशत था, जो कि अब केंचुआ खाद का प्रयोग होने से 0.48 प्रतिशत हो गया है। हम आगे भी जैविक खेती को लेकर कई परियोजनाएं चलाने और किसानों को प्रशिक्षण देने की योजना बना रहे हैं। - डॉक्टर डीआर सिंह, कुलपति सीएसए