बढ़ जाती है नुकसान की आशंका
आमतौर पर भूकंप के दौरान आठ से 10 मीटर तक की गई गहराई में लिक्विफेक्शन का प्रभाव देखा जाता है। लेकिन कानपुर और प्रयागराज में यह असर 40 मीटर तक हो सकता है। कानपुर और प्रयागराज के कई हिस्सों में ज़मीन की ऊपरी परत लगभग 8 से 10 मीटर गहराई तक काफी ढीली, रेतीली और पानी से संतृप्त है। यही परत भूकंप के दौरान लिए सबसे ज्यादा संवेदनशील होती है। जमीन की 30 से 40 मीटर गहराई तक की परतें भूकंपीय तरंगों को सोखने के बजाय उन्हें ऊपर तक पहुंचा देती हैं। इसका असर यह होता है कि भूकंप के झटके कमजोर ऊपरी परतों तक पूरी ताकत के साथ पहुंचते हैं और नुकसान की आशंका बढ़ जाती है।
लिक्वेफेक्शन से क्यों बढ़ता है खतरा
लिक्वेफेक्शन वह स्थिति है जब भूकंप के तेज झटकों से मिट्टी अपनी मजबूती खो देती है और कीचड़ या तरल जैसी हो जाती है। ऐसी स्थिति में इमारतों की नींव धंस सकती है, बहुमंज़िला भवन झुक सकते हैं, सड़कें, पुल और पाइपलाइन क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। गंगा के किनारे बसे इलाके, विशेषकर निचले और रेतीली मिट्टी वाले क्षेत्र, भूकंप के समय अधिक खतरे में रहते हैं। ऐसी मिट्टी भूकंपीय तरंगों को कई गुना बढ़ा देती है, जिससे ज़मीन हिलने का असर ज्यादा विनाशकारी हो जाता है।
निर्माण से पहले जोखिम मानचित्र देखें
प्रो.पात्रा ने कहा कि निर्माण के दौरान अर्थक्वेक हैजर्ड मैप का इस्तेमाल होना चाहिए। विदेशों में यह आम है, वहां निर्माण से पहले ही लोगों को इलाके की संवेदनशीलता पता रहती है। उसी का ध्यान रखते हुए निर्माण कराया जाता है। लेकिन अपने देश में ऐसा नहीं है। उन्होंने कहा कि निर्माण के दौरान नियमों का ध्यान रखें, ग्राउंड इंप्रूवमेंट तकनीक अपनाएं तो बड़े खतरों से बचा जा सकता है।
कानपुर के इन इलाकों से ली गई मिट्टी
बाजिदपुर, बिठूर, मंधना, नारामऊ, आईआईटी, नानकारी, न्यू कानपुर सिटी, पनकी, धर्मगंतपुर,रतनलाल नगर, बाकरगंज, भीमसेन, सोना, बर्रा, चकेरी, कठोंगर, रमईपुर, जाधवपुर , सीढ़ी इटारा, शुभुआ, बिरहर, नरौरा, अंबुज नगर, बिंदकी, जहानाबाद, इन इलाकों में मिट्टी की जांच की गई।