मुसीबत के दौर में दूसरों के काम आना ही इंसानियत है। शुक्रवार को बेनाझाबर निवासी 60 वर्षीय बुजुर्ग गंगा प्रसाद सिंह के निधन पर इंसानियत की मिसाल देखने को मिली। लॉकडाउन के कारण गंगा प्रसाद के सगे संबंधी नहीं पहुंच सके तो उनके घर के आसपास रहने वाले मुस्लिम भाइयों ने अंतिम संस्कार में शामिल होकर शहर की गंगा जमुनी तहजीब का उदाहरण पेश किया।
बेनाझाबर में आजाद पार्क के पास रहने वाले गंगा प्रसाद सिंह नगर निगम में हेड माली के पद पर कार्यरत थे। परिवार में पत्नी, 4 बेटियां और कक्षा 11 में पढ़ने वाला बेटा निखिल है। तीन बेटियों की शादी हो चुकी है। उनका परिवार और सभी रिश्तेदार गोंडा जिले के रहने वाले हैं। गुर्दे की बीमारी के चलते उन्हें करीब 20 दिन पहले कुलवंती अस्पताल में भर्ती कराया गया था। बीमारी के चलते शुक्रवार को उनका निधन हो गया। लॉकडाउन के कारण परिवार का कोई सदस्य नहीं आ सका।
बेटे निखिल ने बताया कि बीमारी की सूचना पर दीदी पहले ही घर आ चुकी थी। उनके अलावा कोई परिवार वाला या रिश्तेदार नहीं आ सका। इसके चलते उनका संस्कार करने के लिए मोहल्ले के युवा, बुजुर्ग और मुस्लिम आगे आए। हिंदुओं और मुस्लिमों ने मिलकर गंगाप्रसाद की शवयात्रा निकाली। हिंदू रीति रिवाज के मुताबिक भैरव घाट पर अंतिम संस्कार कराया। शवयात्रा में क्षेत्र के आफताब आलम, इमरान, नूर आलम, नदीम, मुन्ना, अजीजुल्लाह, सलीम अहमद, सईद, जावेद, जुबैर, इरशाद, यासीन आदि शामिल हुए।
दिख रही गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल
कोरोना के संक्रमण काल में शहर के हिंदू-मुस्लिम समाज के सद्भाव के कई उदाहरण सामने आ चुके हैं। बीते दिनों बाबूपुरवा के मुंशीपुरवा में हिंदू परिवार की वृद्धा का निधन होने पर मुस्लिम भाइयों ने राम नाम सत्य कहते हुए अर्थी को कंधा दिया था। हिंदू रीति रिवाज का पालन करते हुए शव का अंतिम संस्कार कराया था। इसी तरह छावनी निवासी रिक्शा चालक कौशल प्रसाद के निधन के बाद परिजनों के न आ पाने पर हिंदू-मुस्लिम साथ आ खड़े हुए थे। दोनों मजहब के लोगों ने मिलकर कौशल प्रसाद की शवयात्रा निकाली थी। कौशल के शव को हिंदू रीति रिवाज के मुताबिक डबका घाट, जाजमऊ के पास दफनाया गया था।