कानपुर देहात। गोवंश आश्रय स्थल दुर्दशा का शिकार हैं। प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के डेढ़ माह बाद प्रशासकों के खाते नहीं खुल सके हैं। कहीं गायों को सूखा पुआल खिलाकर काम चलाया जा रहा है तो कहीं सूखा भूसा डालकर खानापूरी की जा रही है।
जबकि, सरकार चोकर से लेकर हरा चारा खिलाने के निर्देश दे रही है। जिले में गो आश्रय स्थलों के लिए 40 लाख रुपये का बजट है लेकिन अफसर आश्रय स्थलों से डिमांड न आने की वजह से नहीं दे रहे हैं। आश्रय स्थलों में सफाई से लेकर चारे के इंतजाम में रुपये की कमी आड़े आ रही है।
इधर, चारे के संकट के साथ वहां काम करने वाले गो सेवकों को पारिश्रमिक नहीं मिल पा रहा है। जिले में अफसर आश्रय स्थलों की व्यवस्थाएं दुरुस्त कराने को लेकर गंभीर नहीं है। जिम्मेदार इंतजार कर रहे हैं कि खाता खुल जाएगा तो बजट भेज दिया जाएगा। सवाल यह है कि क्या गायों की भूख खाता खुलने का इंतजार करेगी।
केस एक-
सिकंदरा के गुरदही बुजुर्ग गांव के वृहद गो संरक्षण केंद्र में 257 गोवंश हैं। उन्हें रोकने के लिए बनाई बाड़ को सांड़ों ने तोड़ दिया है। जब मर्जी हुई बाहर निकाल जाते हैं। गायों की सेवा के लिए राजकुमार, छोटू, लल्लन, रामगोपाल, अवधेश कुमार तैनात हैं। इन्हें नवंबर माह से पारिश्रमिक नहीं मिला। इससे इनके चूल्हेे ठंडे हो गए हैं। चारे का प्रबंध दुरुस्त नहीं हैं। कहीं सूखा भूसा को तो कहीं पुआल डाल दिया जाता है।
केस दो-
राजपुर के सिल्हौला बुजुर्ग आश्रय स्थल में 25 गोवंश हैं। रविवार को आश्रय स्थल में देखरेख के लिए कोई मौजूद नहीं था। गो सेवकों के मोबाइल नंबर पर संपर्क किया गया तो उमाशंकर ने बताया कि वह चारे के प्रबंध के लिए बाहर आए हैं। बताया कि दो माह से पारिश्रमिक नहीं मिला। गायों को पुआल खिलाकर काम चलाया जा रहा है।
केस तीन-
रसूलाबाद के असालतगंज में 185 गोवंश हैं। वहां एक गोवंश बीमार है। ठंड से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए। सात गो सेवक तैनात हैं उन्हें छह माह से मानदेय नहीं मिला है। वह भी काम करने में रूचि नहीं ले रहे हैं। आश्रय स्थल में गोबर व गंदगी फैली पड़ी है।
प्रधानों का कार्यकाल खत्म होने के बाद एक सप्ताह के अंदर प्रशासकों को खाता खुलवाने के निर्देश दिए गए थे। अभी तक क्यों नहीं खुले इसकी जानकारी की जाएगी। गो आश्रय स्थलों की देखरेख में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी
-सौम्या पांडेय, सीडीओ