कार्डियोलोजी में ल्यूटेमबाकर सिंड्रोम का इलाज करने वाले डॉ अवधेश कुमार टीम के साथ
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कानपुर। एलपीएस कार्डियोलॉजी इंस्टीट्यूट में दूरबीन विधि से बिना चीरा लगाए दिल का छेद बंद कर दिया गया और सिकुड़ा वाल्व फुला दिया गया। आमतौर पर ऐसे मर्ज का इलाज चीरा लगाकर किया जाता है। इलाज करने वाले कार्डियोलॉजी के प्रोफेसर डॉ. अवधेश कुमार शर्मा ने बताया कि इसे ल्यूटेम वाकर सिंड्रोम कहते हैं। यह 10 लाख लोगों में एक व्यक्ति को होता है। यह इंस्टीट्यूट का पहला केस रहा है।
उन्नाव की रहने वाली 43 वर्षीय महिला के रुमेटिक हार्ट डिजीज के कारण दिल के बाए तरफ के वाल्व में सिकुड़न आ गई थी। इससे ब्लड प्रेशर बढ़ा हुआ था और सांस में लेने में दिक्कत हो रही थी। जब उसकी जांच की गई तो पता चला दिल के ऊपरी दो चैंबर के बीच छेद रहा है। डॉ. शर्मा ने बताया कि दिल के ऊपरी चैंबर में यह छेद पैदाइशी होता है और 20-23 वर्ष की उम्र होने पर पता चलता है। अमूमन इसका इलाज ओपन हार्ट सर्जरी से किया जाता रहा है लेकिन इसका इलाज बिना चीरा के किए गया। पैर की नस से कैथेटर डाल कर सिकुड़ा वाल्व फुला दिया गया। साथ ही एएसडी डिवाइस डालकर दिल का छेद बंद कर दिया गया। उन्होंने बताया कि रोगी स्वस्थ है, उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। निदेशक प्रो. राकेश कुमार वर्मा और कार्डियोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. उमेश्वर पांडेय ने टीम को बधाई दी।