बाहरी राज्यों से शहर आए हुनरमंद ज्वैलरी कारीगरों का हौसला अब टूट रहा है। उत्तर प्रदेश के सबसे बड़े सराफा मार्केट में बीते 10 माह से यहां मनमाफिक काम न मिलने से सैकड़ों कारीगर पहले ही शहर छोड़ चुके हैं। अब नोट बंदी ने बची उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया।
दरअसल सराफा कारोबार इन दिनों एक साथ कई कारणों से बुरे दौर से गुजर रहा है। सबसे ज्यादा असर जेवर बनाने वाले कारीगरों पर पड़ा है। गत फरवरी में सोने में एक फीसदी एक्साइज के विरोध में 42 दिन की बंदी में भी सबसे ज्यादा ज्वैलरी कारीगर ही प्रभावित हुए थे। यहां सबसे ज्यादा कारीगर पश्चिम बंगाल के हैं। तब 40 फीसदी कारीगर यहां से चले गए थे।
दो माह बाद इस उम्मीद से लौटे थे कि सहालग, नवरात्र, करवाचौथ, धनतेरस और दीपावली में सोने का कारोबार पुराने दौर में लौटेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसक बाद फिर उम्मीद जगी कि सहालग में कारोबार बढ़ेगा लेकिन यह भी नहीं हुआ। ठीक सहालग के मौके पर नोट बंदी ने ज्वैलरी कारीगरों का हौसला तोड़ दिया है।
2500 कारीगर छोड़ चुके शहर
बीते 10 माह से ज्वैलरी की डिमांड 50 फीसदी तक कम हो गई है। कारीगरों के सामने रोजगार का संकट पैदा हो गया है। अब तक करीब 2500 कारीगर शहर छोड़कर जा चुके हैं। इनमें से अधिकतर ने अपना काम ही बदल दिया। --विश्वजीत पॉल,
सराफा कारोबार मंदी का शिकार
सराफा कारोबार मंदी का शिकार हो गया है। नवरात्र में 50 फीसदी भी कारोबार नहीं हुआ, जबकि नवरात्र में धनतेरस की तरह ही खरीद होती है। यही हाल धनतेरस करवाचौथ का रहा। सहालग के दौर में नोट बंदी से तो कमर ही टूट गई। --पंकज अरोड़ा, महामंत्री कानपुर महानगर सराफा एसोसिएशन
ये हैं कारीगरों के गढ़
शहर में ज्वैलरी बनने के तीन बड़े ठिकाने हैं। बिरहाना रोड, नील वाली गली नयागंज, चतुर्थ भुज गली और धोबीमोहाल। यहां छोटे बड़े करीब 500 से अधिक कारखाने हैं। इसके अलावा शहर भर में फुटकर कारखाने भी हैं। इनकी संख्या सौ के आसपास है। एक कारखाने में 10 से 40 व्यक्ति तक काम करते हैं। बताते हैं कि अब तक यहां से करीब दो हजार कारीगर बोरिया बिस्तर समेट चुके हैं।