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Exclusive: आंगन से लेकर चूल्हे तक हर घर में दफन हैं अपनों के शव, यहां फकीरों को नहीं मिली दो गज जमीन

Mon, 27 Jul 2020 04:18 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा सुनील कुमार मिश्रा, अमर उजाला, इटावा
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चूल्हे के पास बनी कब्र - फोटो : amar ujala

इटावा के चकरनगर तहसील से चंद कदम की दूरी पर स्थित तकिया मजरा के मुस्लिम समुदाय के फकीरों की बस्ती का हर घर कब्रिस्तान बना है। आंगन से लेकर चूल्हे तक अपनों की कब्रें ही कब्रें हैं। प्रशासन और पंचायती राज व्यवस्था की उपेक्षा के शिकार फकीरों को अपनों के शव दफन करने के लिए दो गज जमीन मयस्सर नहीं हो रही है।
 

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घर में बनी कब्र दिखाते लोग - फोटो : amar ujala

शहर ईदगाह के इमाम मौलाना कमालुद्दीन असरफी का कहना है कि हदीस में कब्रों को जिंदा इंसान की तरह ही माना गया है। कब्रिस्तान की व्यवस्था इसलिए बनाई गई है ताकि कब्रों को पाक रखा जाए और उनकी कद्र हो सके। लेकिन हालात के शिकार यहां के फकीर मजहबी पाबंदियां तोड़कर कब्रों के साथ गुजर-बसर करने को मजबूर हैं।

जिला मुख्यालय से करीब 40 किमी दूर चकरनगर कस्बे से ठीक सटे तकिया मजरा में मुस्लिम आबादी में करीब सौ घर फकीरों और दस परिवार मनुहारों के हैं। मनुहारों को प्रशासन ने कई साल पहले तहसील के पास कब्रिस्तान की जगह दी जो जातिय संघर्ष का कारण बन गई। मनुहारों ने फकीरों को यहां शव दफन करने से रोक दिया।
 

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घर में बनी कब्र दिखाता युवक - फोटो : amar ujala

मजदूरी करके गुजर-बसर करने वाले फकीर विरोध करने के हालत में नहीं थे लिहाजा प्रशासन से गुहार लगाई। लेकिन प्रशासन ने इनकी नहीं सुनी और नेताओं ने इसे वोट बटोरने का मुद्दा बना लिया। अलग-अलग पार्टी के प्रतिनिधि सालों तक इन्हें कब्रिस्तान का आश्वासन देकर वोट लेते रहे।

आखिरकार फकीरों को उनकी फितरत समझ आई और अपनी आवाज को दिल में दबाकर हालात से समझौत कर लिया। 70 के दशक में यहां घर के भीतर लाशे दफनाने का सिलसिला शुरू हुआ था। आलम यह है कि हर घर में चूल्हे से लेकर आंगन तक पांच से सात कब्रें बनी हैं।

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तकिया गांव जहां हर घर में है एक कब्र - फोटो : amar ujala

दीन के खिलाफ है घरों में कब्रों का होना
शहर ईदगाह के इमाम मौलाना कमालुद्दीन असरफी का कहना है कि इस्लाम धर्म में कब्रों को पूर्वजों की रुह मानकर उन्हें जिंदा इंसान का ही दर्जा दिया गया है। हदीस में नबी ने कहा है कि कब्र को तकलीफ नहीं दे सकते। कब्रों के लिए जेहन में वहीं संजीदगी होनी चाहिए जो जिंदा इंसान के लिए होती है।

सब-ए-बारात में कब्रों पर पूर्वजों की रुहों के सुकून के लिए दुआ मांगी जाती है। तकिया के लोगों के पास ढंग की छत भी नहीं है। उनके घरों में बनी कब्रों को वह इज्जत नहीं मिल सकती जो होनी चाहिए। इसपर प्रशासन को गंभीरता से विचार करके जल्द ही कब्रिस्तान की व्यवस्था करनी चाहिए।

 

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कुछ ऐसा है घरों का हाल - फोटो : amar ujala
बाउंड्री पर करोड़ों खर्च, यहां जमीन नहीं मिली
पिछली सपा सरकार में प्रदेश भर के कब्रिस्तानों की बाउंड्री बनाने पर करोड़ों रुपये खर्च हुए थे। इटावा नगर पालिका के चेयरमैन नौशाबा फुरकान का कहना है कि वर्ष 2014-15 में कब्रिस्तानों को चिंहित कर बाउंड्रीवाल बनाने के लिए कमेटी बनी थी।

उस वक्त तकिया में कब्रिस्तान की समस्या पर चर्चा हुई थी। इसके लिए जमीन की तलाश शुरु हुई जो थोड़े दिनों बाद ठप हो गई। यहां कब्रिस्तान की जमीन के लिए प्रशासन को कई बार प्रार्थना पत्र दिया गया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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