कानपुर में बीआईसी की चल संपत्तियों को बचाने के लिए बीआईसी प्रबंधन की ओर से की जा रही लचर पैरवी की पोल खुल रही है। महज 4 करोड़ के लोन के लिए 34 करोड़ से अधिक की चल संपत्तियां दांव पर लगी हैं। वहीं संपत्तियां बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने की तैयारी कर रहे बीआईसी प्रबंधन का कहना है कि ग्रीष्म कालीन कोर्ट में याचिका मई के अंत तक या फिर जून के पहले सप्ताह में दाखिल की जाएगी। फाइलें गुम होने की जांच शुरू कर दी गई है।
2004-05 में तत्कालीन सरकार के हस्तक्षेप के बाद बैंकों और प्रबंधन के बीच मूलधन अदायगी को लेकर समझौता हुआ था। लेकिन बाद में सरकार बदलने पर मामला ठंडा पड़ गया। 2007 में एक बार फिर समझौता हुआ। लेकिन अफसरों की लापरवाही से बात फिर आगे नहीं बढ़ी। इसके बाद बैंकों ने लोन वसूली की जिम्मेदारी कोटक महिंद्रा को सौंप दी। बैंक ने लोन वसूली के प्रयास किए लेकिन बात नहीं बनी तो बैंक की ओर से कोर्ट में याचिका दाखिल की गई।
बाद में कोर्ट ने मिल की संपत्तियों का आंकलन करने के लिए लिक्विडेटर तैनात कर दिया था। बीआईसी के सूत्रों ने बताया कि 2013 में बीआईसी की ओर से 1 करोड़ 92 लाख रुपये लोन चुकाने के लिए दिए गए थे। इसके बाद से लगातार कोर्ट में मामला चल रहा था। लचर पैरवी का ही परिणाम है कि कानपुर टेक्सटाइल की प्लांट, मशीनरी और फिक्सचर की नीलामी की जा रही है।