कानपुर देहात के बहुचर्चित बेहमई कांड का 43 साल बाद कोर्ट ने बुधवार शाम फैसला सुनाया। एंटी डकैती कोर्ट के विशेष न्यायाधीश अमित मालवीय की अदालत ने श्यामबाबू (65) को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही 50 हजार का अर्थदंड भी लगाया है। वहीं, एक अन्य आरोपी विश्वनाथ को सबूतों के अभाव में दोषमुक्त करार दिया है।
देश ही नहीं पूरी दुनिया को झकझोर कर रख देने वाला बेहमई नरसंहार कांड कानूनी दांवपेच में ऐसा उलझा कि बहुप्रतीक्षित फैसला आने में 43 साल लग गए। 35 आरोपियों में से सिर्फ पांच ही जिंदा बचे हैं। इनमें से भी तीन फरार हैं। एक को बुधवार को कोर्ट ने सजा सुना दी, जबकि दूसरे को अभयदान मिला।
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न्याय का एक सिद्धांत है कि भले ही सौ दोषी छूट जाएं लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिए। वहीं, कानून यह भी मानता है कि देर से मिला न्याय अन्याय के समान होता है। इन दोनों विरोधाभासी सिद्धांतों पर खरा उतरने की कोशिश का अक्सर आरोपियों को फायदा मिल जाता है।
बेहमई कांड से संबंधित मुकदमे के आरोपियों के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। सजा काटने के लिए न तो अभियुक्त जिंदा बचे और न ही इस वीभत्स हत्याकांड की एफआईआर दर्ज कराकर इंसाफ की जंग लड़ने वाला वादी मुकदमा राजाराम।
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30 साल बाद तय हो सके थे आरोप
शासकीय अधिवक्ता राजू पोरवाल ने बताया कि 35-36 डकैत आरोपी बनाए गए थे। कानून के अनुसार मुकदमे में आरोप तय करने के लिए सभी आरोपियों का कोर्ट में हाजिर होना जरूरी होता है। कानून की इसी पेचीदगी का फायदा आरोपी उठाते रहे। हर तारीख पर कोई न कोई आरोपी गैर हाजिर हो जाता और आरोप तय नहीं हो पाते थे। 30 साल बाद वर्ष 2012 में आरोप तय हो सके थे।
सरकार वापस लेना चाहती थी मुकदमा
बेहमई कांड की मुख्य अभियुक्त फूलन देवी कोर्ट में हाजिर नहीं हो रही थी। इसी दौरान उसके समर्पण की सूचना आई और फिर वह सांसद बन गईं। फूलन जब सत्ता में आईं तो सरकार की ओर से खुद ही मुकदमे को जनहित में वापस लेने की कवायद शुरू हो गई। हालांकि अभियोजन अधिकारी की ओर से दी गई मुकदमा खत्म करने की अर्जी को दस्यु संबंधित मामलों की सुनवाई के लिए गठित विशेष न्यायालय के न्यायाधीश ने खारिज कर दिया था।
हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली थी। इस दौरान सुनवाई के लिए सारा रिकॉर्ड हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट गया और फाइलें वापस सेशन कोर्ट आईं। इस कवायद में काफी समय बर्बाद हुआ। इसके बाद फूलन देवी की हत्या हो गई। धीरे-धीरे कई अन्य आरोपियों की भी मौत हो गई।
43 साल बाद भी तीन आरोपी पुलिस की पकड़ से दूर
बेइमई कांड के बाद शुरुआती दौर में पुलिस ने काफी तेजी दिखाई। इसी का नतीजा था कि घटना के एक साल के भीतर ही सभी आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट कोर्ट भेज दी गई थी। दूसरा पहलू यह भी रहा कि 43 साल बाद भी पुलिस तीन आरोपियों रामरतन, मानसिंह और अशोक उर्फ विश्वनाथ को गिरफ्तार नहीं कर सकी है। तीनों के खिलाफ कोर्ट ने कुर्की कार्रवाई के आदेश के साथ ही स्थाई गिरफ्तारी वारंट भी जारी कर रखा है।
दो साल पहले हो गई थी मुख्य गवाह जंटर सिंह की मौत
वादी मुकदमा राजाराम की 85 वर्ष की उम्र में बीमारी के चलते मौत हो गई। 2021 में मुख्य गवाह जंटर सिंह की भी मौत हो गई। वहीं 2019 में जेल में बंद आरोपी रामसिंह की मौत हो गई थी। इसके बाद आरोपी भीखा व पोसा की भी मौत हो गई थी।
घटना के समय नाबालिग था विश्वनाथ
मामले की सुनवाई दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता गिरीश नारायण दुबे ने आरोपी विश्वनाथ के घटना के समय नाबालिग होने का मुद्दा अदालत के सामने उठाया था। साथ ही उसके शैक्षणिक प्रपत्रों को पेश किया था जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने 23 दिसंबर 2015 को आरोपी विश्वनाथ को अपचारी किशोर घोषित किया था लेकिन मामले की सुनवाई अन्य आरोपियों के साथ ही चलाने के आदेश दिए थे।
शिनाख्त मेमो व आरोपपत्र पत्रावली में न होने का उठाया मुद्दा
बचाव पक्ष ने कोर्ट में पत्रावली में आरोपपत्र व शिनाख्त मेमो न होने का मुद्दा उठाया था। उन्होंने अदालत को बताया था कि 5 सितंबर 2007 को मामले में आरोपी राम सिंह, रतीराम, भीखा व बाबूराम के खिलाफ कोर्ट में आरोप तय किए गए थे। बाद में 4 अगस्त 2012 को आरोपी राम सिंह, पोसा, भीखा, विश्वनाथ व श्यामबाबू के खिलाफ मामले में दोबारा आरोप तय किए गए थे। बचाव पक्ष ने पत्रावली में 5 सितंबर 2007 का आरोपपत्र मौजूद न होने की बात कही थी। साथ ही आरोपी मान सिंह, रामकेश, माताप्रसद, बालादीन व रामदीन के शिनाख्त मेमो भी फाइल में नहीं होने की बात कही थी।
मूल केस डायरी न होने का भी मुद्दा उठा
मामले में पूरा विचारण हो जाने पर 2020 में दोनों पक्षों की बहस भी हो गई थी जिसपर अदालत का फैसला आने की अटकलें लगाई जा रही थीं। इसी दौरान बचाव पक्ष ने अदालत के सामने पत्रावली में मूल केस डायरी न होने का मुद्दा उठा दिया था जिसके चलते मामले में 2020 में फैसला आते आते रह गया था।