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बेहमई कांड : न्याय की आस लिए चल बसे चश्मदीद जंटर सिंह

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जंटर सिंह का फाइल फोटो। (संवाद) - फोटो : AKBARPUR
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कानपुर देहात। बेहमई में 14 फरवरी 1981 का मंजर देखने वाले जंटर सिंह (70) की बुधवार को बीमारी से मौत हो गई। उनका लखनऊ पीजीआई में उपचार चल रहा था। वह घटना के चश्मदीद गवाह थे। बेहमई कांड में फूलन देवी समेत 36 डकैतों पर रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी।
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पूरे देश को दहला देने वाला बेहमई कांड लचर पैरवी और कानूनी दांवपेच में ऐसा उलझा कि 40 साल में भी पीड़ितों को न्याय नहीं मिल सका। इस बहुचर्चित मुकदमे में नामजद अधिकांश डकैतों के साथ ही 28 गवाहों की मौत हो चुकी है। आरोपी मान सिंह, विश्वनाथ व रामकेश मुकदमे में 40 साल से फरार चल रहे हैं। कुर्की के साथ इनके स्थायी वारंट जारी किए गए। मुकदमे से इनकी पत्रावली अलग कर बाकी बचे आरोपितों के खिलाफ सुनवाई चल रही है। इनमें डकैत पोसा, भीखा, विश्वनाथ (दूसरे), श्याम बाबू ही बचे हैं। इनके खिलाफ पीड़ितों को आज भी कोर्ट के फैसले का इंतजार है।
करीब डेढ़ साल पहले लगा कि अब फैसला होने वाला है तो कोर्ट की पत्रावली में केस डायरी न मिलने से मामला लटक गया। मुकदमे की सक्रिय पैरवी करने वाले राजाराम सिंह की 13 दिसंबर 2020 को मौत हो गई थी। इसके बाद गांव के लोगों ने जंटर सिंह को घटना में बतौर वादी के रूप में पैरवी करने की जिम्मेदारी सौंपी थी। जंटर सिंह फिलहाल पैरवी कर रहे थे। फूलन देवी ने गांव में जिन 26 लोगों को लाइन में खड़ा कर गोलियां दागी थी। उनमें जंटर सिंह भी थे। इन्हें तीन गोलियां लगी थीं। उपचार के दौरान इन्हें बचाने में डॉक्टर कामयाब रहे। बुधवार रात बीमारी से जंटर सिंह की लखनऊ में मौत हो गई। उनका परिवार काफी समय से पुखरायां में रह रहा है, लेकिन परिजन शव पैतृक गांव ले गए। ये खबर क्षेत्र में फैली तो गुुरुवार सुबह बेहमई में लोगों की भारी भीड़ एकत्र हो गई। गांव के बाहर यमुना नदी में शव का अंतिम संस्कार किया गया। बड़े बेटे रिंकू ने मुखाग्नि दी। पत्नी माया देवी, बेटे सोनू, मोनू व अनिल रोते बिलखते रहे।
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जंटर सिंह चश्मदीद गवाह थे। मामले में उनकी गवाही हो चुकी है। इससे उनके निधन से पत्रावली परीक्षण में कोई असर नहीं पड़ेगा। साथ ही न ही इसका असर कोर्ट के फैसले में होगा। - राजू पोरवाल, जिला शासकीय अधिवक्ता फौजदारी
तीन गोलियां लगने के बाद नहीं छोड़ी थी हिम्मत
राजपुर। बेहमई गांव में फूलन देवी के कहर का शिकार हुए जंटर सिंह ने अपनी आंखों के सामने परिवार व ग्रामीणों समेत 20 लोगों को खो दिया था। गांव के वकील सिंह ने बताया कि फूलन ने लाइन में खड़ा कर गोलियां चलाई तो कई लोग आवाज सुनकर गोली लगने के सदमे में गिर गए थे। जंटर सिंह को तीन व वकील सिंह को दो गोली लगी थीं। दोनों का लखनऊ व कानपुर में लंबे समय तक इलाज चला था। तबियत में सुधार होने के बाद सदमे से कई साल तक दोनों नहीं उबर पाए थे। वहीं, वकील सिंह बताते हैं कि वह दिन याद कर आज भी रूह कांप जाती है।
अगर समय से आ जाता फैसला तो मिलती खुशी
राजपुर। बेहमई कांड की विधवा संतोषी देवी, रामवती, मुन्नी देवी आदि ने कहा कि अब न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है। जिन लोगों ने फूलन की क्रूरता का दर्द झेला वह भी न्याय की आस में दुनिया छोड़ते जा रहे हैं। वहीं, फूलन समेत अधिकांश आरोपी भी दुनिया छोड़ चुके हैं। कुछ आरोपी बचे हैं तो उनकी भी हालत खराब है। अगर समय से कोर्ट से फैसला आ जाता तो बात कुछ और होती। इतने बड़े सामूहिक नरसंहार की घटना में ऐसे दांवपेच फंसाए गए कि समय से न्याय नहीं मिल सका। महिलाओं ने कहा कि न्याय की आस लिए राजाराम सिंह के बाद अब जंटर सिंह भी चले गए। इसी साल श्रीदेवी की भी मौत हो गई है। उनके पति सुरेंद्र सिंह फूलन नरसंहार का शिकार हुए थे। (संवाद)
बेहमई कांड के बाद फूलन पर बनी फिल्म
राजपुर। बेहमई कांड इतना चर्चित रहा कि उस पर फिल्म बैंडिट क्वीन बनाई गई। हालांकि गांव के लोग फिल्म से बेहद नाराज हैं। पूर्व प्रधान गांधी सिंह ने कहा कि फिल्म इंडस्ट्रीज के लोगों ने बिना पूरे तथ्य समझे ऐसी कहानी गढ़ दी जिससे पीड़ितों की आत्मा को दुख हुआ है। फूलन पर कोई अत्याचार नहीं किया गया था। साथ न ही इस तरह का कोई कभी आरोप लगा था। गांव के वकील सिंह ने बताया कि फूलन को शक था कि ठाकुर बिरादरी के बदमाश श्रीराम व लालाराम को बेहमई के लोग पनाह देते हैं। फूलन का उनसे गैंगवार चलता था। फूलन ने गांव में आकर कई बार सामूहिक ऐलान किया था कि अगर लालाराम व श्रीराम की मदद बंद न की गई तो गांव के लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाएगा। इसके बाद कुछ ही दिन बाद उसने दोबारा गांव में धावा बोलकर सामूहिक नरसंहार का खेल खेला। (संवाद)
पत्रवाहक की मिली थी नौकरी
राजपुर। बेहमई कांड में गोली लगने से घायल हुए जंटर सिंह को वर्ष 1983 में भोगनीपुर तहसील में बतौर पत्रवाहक की नौकरी मिल गई। इस पर वह 1984 में गांव से परिवार लेकर पुखरायां में रहने लगे। वहीं मकान बना लिया था। वर्ष 2019 में वह रिटायर हो गए। फिलहाल परिवार के साथ पुखरायां में रहते थे। राजाराम सिंह की मौत के बाद वह बेहमई कांड में पैरवी के लिए आगे आए थे। उनकी मौत होने से गांव के लोगों में दुख के साथ मायूसी भी है। (संवाद)
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