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हसीन सपने दिखाकर बांग्लादेशी किशोरी को मामी ने जिस्म के धंधेबाजों को सौंपा, नहीं छोड़ा हौसला, बनी अपराजिता की मिसाल

Sun, 14 Feb 2021 03:02 PM IST
शिखा पांडेय आशीष अग्रवाल, अमर उजाला, कानपुर
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला
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सिर से मां का साया उठने के बाद पिता ने भी मुंह मोड़ लिया। बड़ी बहन के साथ जीवन काट रही किशोरी को मां समान मामी ने एक खूबसूरत जिंदगी के हसीन सपने दिखाए। धीरे-धीरे युवावस्था की ओर बढ़ रही किशोरी दिल में कई अरमान समेटे अपनी मामी के भरोसे पर बांग्लादेश छोड़ भारत के लिए निकल पड़ी।
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दो देशों के बीच की दूरी, आने-जाने के नियम-कानून और दुनियादारी से अनजान किशोरी मामी के बहकावे में आकर उस गैंग के सदस्यों के बीच फंस गई जो किशोरियों की खरीद-फरोख्त के काले धंधे में लिप्त हैं।

अपने गांव से ढाका, ढाका से कोलकाता और कोलकाता से कानपुर तक का सफर तय करने में उसे आठ दिन लगे। मामी द्वारा भेजे गए लोगों के साथ सियालदाह में एक होटल में रुकने के दौरान बातचीत से उसे इन लोगों के गलत इरादे का अंदेशा हो गया।
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फिर भी वह अपने शक को पुख्ता करने के लिए उन लोगों के साथ ट्रेन में सवार हो गई। ट्रेन में मामी और उन लोगों के बीच वीडियो कॉल पर हुई बातचीत से उसे खुद के अपराधियों के बीच फंस जाने की बात समझ आ गई। इसके बाद भी उसने हौसला नहीं छोड़ा।
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ट्रेन में स्कॉर्ट ड्यूटी पर तैनात सिपाहियों को उसने अपना दर्द बताने की कोशिश की। वह हिंदी नहीं जानती थी इस पर ट्रेन में सफर कर रहे बांग्ला भाषा के एक जानकार को उसने सारी कहानी सुनाई। सूचना पर पहुंची जीआरपी ने कानपुर सेंट्रल स्टेशन से किशोरी की सकुशल बरामदगी कर दो आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया। आरोपी जेल गए जबकि किशोरी को राजकीय बालिका गृह भेज दिया गया।

खान-पान, रहन-सहन, अजनबी लोग अनजानी भाषा इन सबके बीच यहां उसने एक नई शुरुआत की। अपनी रोजमर्रा की समस्याओं को बताने और दूसरों की बातों को समझने में भाषा उसके सामने बड़ी चुनौती थी इसलिए सबसे पहले उसने हिंदी भाषा सीखने का बीड़ा उठाया।

इस काम में उसकी मदद वहां की अनुवादक ने की। लगभग एक साल बीतने के बाद अब युवती की हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ हो गई है। वह हिंदी को अच्छी तरह समझ व बोल सकती है। पिछले डेढ़ साल में उसे कई कड़वे अनुभव हुए लेकिन इन सबके बावजूद भारत में मिले अच्छे लोगों ने हर कदम पर उसकी मदद की।

उनसे मिले प्यार, सहयोग और अपनेपन की यादों को मन में समेटे और एक नई भाषा के ज्ञान का दीप जलाए युवती जल्द ही बांग्लादेश वापस लौटना चाहती है। युवती को बस मुकदमे के फैसले का इंतजार है। उसका यह इंतजार भी इसी माह खत्म होने की उम्मीद है। आत्मविश्वास और हौसले से लबरेज यह बांग्लादेशी युवती अपराजिता की मिसाल बन चुकी है।
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