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बकस्वाहा जंगल मामला: दलीलें दरकिनार कर एनजीटी ने सुनाया फैसला, 30 पेज की कंपनी की दलील को नहीं दी कोई तवज्जो

Sat, 03 Jul 2021 11:16 AM IST
प्रभापुंज मिश्रा न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बांदा

सार

कंपनी का कहना था कि खनन में निकाले गए भूजल की भरपाई के लिए बारिश के पानी की हार्वेस्टिंग की जाएगी। सूचना के मुताबिक, हीरा खनन परियोजना में हर साल 5.3 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी की जरूरत होगी।
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बकस्वाहा जंगल - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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हीरा कंपनी की तमाम दलीलों को दरकिनार कर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल मामले में पेड़ों की कटान पर रोक लगाने का महत्वपूर्ण आदेश देकर पर्यावरण के पैरोकारों में और जोश भी दिया है। संबंधित हीरा कंपनी ने अपने 30 पेज के हलफनामे में कहा था कि 2.15 लाख पेड़ कई वर्षों में कटेंगे। उनके बदले कंपनी 3.80 लाख पेड़ भी लगाएगी।
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दलील में कहा था कि इस काम में कंपनी 15 करोड़ रुपये भी खर्च करेगी। मध्यप्रदेश स्थिति बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल में हीरा खनन के लिए पट्टा लेने वाली बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग एडं इंडस्ट्रीज कंपनी ने एनजीटी में सुनवाई के दौरान अपना हलफनामा दिया। बकस्वाहा बचाओ आंदोलन से जुड़े पर्यावरण कार्यकर्ता और याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता डॉ. पुष्पराग ने बताया कि हीरा कंपनी ने बुधवार को 30 पृष्ठीय हलफनामा दाखिल किया था।

कंपनी का कहना था कि खनन में निकाले गए भूजल की भरपाई के लिए बारिश के पानी की हार्वेस्टिंग की जाएगी। सूचना के मुताबिक, हीरा खनन परियोजना में हर साल 5.3 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी की जरूरत होगी। एनजीटी की दो सदस्यीय बेंच के जस्टिस श्यो कुमार सिंह व अरुण कुमार वर्मा ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि बिना वन विभाग की अनुमति के एक भी पेड़ न काटा जाए।
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वन संरक्षण कानून 1980 का पालन और टीएन गोधा वर्मन कमेटी की गाइडलाइन और भारतीय वन अधिनियम 1927 का पालन किया जाए। एनजीटी में यह रिट ओपी जिंदल ग्लोबल यूनीवर्सिटी में एलएलबी द्वितीय वर्ष के छात्र उज्ज्वल शर्मा और दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता पीजी नाजपांडेय ने दायर की है। एनजीटी दोनों याचिकाओं को एक में मिलाकर सुनवाई कर रही है। उधर, एनजीटी के रोक लगाने की कार्रवाई से पर्यावरण प्रेमियों में जहां खुशी की लहर है, वहीं उनमें जोश का संचार भी हुआ है।

 
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खामोश नहीं बैठेंगे अभी पैरोकार 
एनजीटी द्वारा बकस्वाहा जंगल की कटान पर लगाई गई अंतरिम रोक ने जहां इस मुद्दे पर आंदोलनरत पर्यावरण पैरोकारों का हौसला बढ़ाया है, वहीं यह पैरोकार अभी खामोश नहीं बैठेंगे। उनका कहना है कि बकस्वाहा जंगल को बचाने के अंत तक निर्णायक आंदोलन चलेगा।

पदयात्रा शुरू, बकस्वाहा में आज जन संवाद 
पहली जुलाई से बुंदेलखंड के युवाओं ने बकस्वाहा जंगल बचाने को पदयात्रा शुरू की है। यह मध्यप्रदेश के दमोह तहसील परिसर से शुरू हुई है। हाथों में तिरंगा लिए युवा लगातार आगे बढ़ रहे हैं। यह तीन जुलाई को बकस्वाहा पहुंचेंगे। वहां जन संवाद होगा। उधार, छतरपुर में अमित भटनागर, शरद कुमरे की टीम पहले से ही गांवों में संवाद मिशन में जुटी है। वहीं, पन्ना बख्तरी में आदिवासी वनवासी क्रांति सेना आंदोलन का खाका तैयार कर रही है। 

डीएम बोले, अटकलों पर नहीं, तथ्यों पर ध्यान दें  
बकस्वाहा जंगल को लेकर संगठनों द्वारा किए जा रहे दावों और मीडिया में चल रहीं खबरों को छतरपुर के जिला कलक्टर शीलेंद्र सिंह ने गलत बताया है। कहा कि अटकलों पर नहीं, तथ्यों पर ध्यान दें। डायमंड कंपनी द्वारा पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए वनों का समुचित विकास किया जाएगा। बारह से पंद्रह वर्षों में जरूरत के मुताबिक पेड़ कटेंगे। एक साथ नहीं। कहा कि हीरा खनन करने वाली कंपनी 3.40 लाख पौधेे लगाकर उनकी देखरेख भी करेगी। इसके लिए 200 करोड़ रुपये वन विकास समृद्धि के लिए जमा कराए जाएंगे। 

 
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1.60 करोड़ लीटर पानी रोज होगा खर्च 
बकस्वाहा जंगल के पैरोकार अमित भटनागर का कहना है कि बुंदेलखंड वैसे भी पानी के लिए परेशान है। बकस्वाहा में सैकड़ों फीट नीचे खुदाई की जाएगी। भारी मात्रा में भूजल बर्बाद होगा। हीरा खदान के लिए एक करोड़ 60 लीटर पानी रोज लिया जाएगा। अमित का कहना है कि हीरा कंपनी 400 लोगों को रोजगार देने का दावा कर रही है, जबकि इस जंगल में मौजूद महुआ, चिरौंजी, चिरुआ आदि के पेड़ों से पांच हजार से ज्यादा लोग रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। बताया कि यह सब आदिवासी हैं। सरकार की योजनाएं इन तक नहीं पहुंच पाती। अमित का कहना है कि हरित सत्याग्रह करेंगे। सरकार हमारे संविधानिक अधिकारों को नहीं दबा सकती है। कहा कि आखिरी सांस तक बकस्वाहा जंगल बचाने की लड़ाई लड़ी जाएगी।

विधायक कर चुके हैं पुनर्विचार का अनुरोध
बकस्वाहा जंगल की पैरोकारी में जन प्रतिनिधि भी शामिल हैं। मध्य प्रदेश विस के चार विधायकों ने लिखित तौर पर पैरोकारी की है। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र भेजकर हीरा खनन परियोजना पर पुनर्विचार का अनुरोध किया है। कहा कि जब आक्सीजन नहीं होगी तो मानव जीवन नहीं होगा। इंसान नहीं होंगे तो हीरे कौन खरीदेगा। विधायकों में नीरज विनोद दीक्षित (महाराजपुर, छतरपुर), राजेश शुक्ला उर्फ बबलू भइया (बिजावर) और विपिन वानखेड़े (आगर, मालवा) और डॉ. हिरालाल अलावा (दिल्ली) शामिल हैं।  

पन्ना से कई गुना हीरों का अनुमान
बकस्वाहा जंगल में मध्य प्रदेश की सबसे बड़ी हीरा खदान बताई जा रही है। कहा जा रहा कि यहां 22 लाख कैरेट के हीरे मिल सकते हैं। यह पन्ना से भी कई गुना ज्यादा हैं। मध्यप्रदेश सरकार ने दो दशक पहले यहां सर्वे कराया था। दो साल पहले नीलामी में बिड़ला समूह की कंपनी ने 50 साल के पट्टे में ले लिया। बकस्वाहा जंगल का रकबा 382.13 हेक्टेयर बताया जा रहा है। इसमें हीरा खनन सिर्फ 62.64 हेक्टेयर में होगा। शेष में मलबा आदि के काम होंगे।
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