असम की विधानसभा में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने खुलासा किया है कि वो यूपी के कन्नौज के मूल निवासी हैं। कन्नौज से आकर हमारे पूर्वज यहां बसे थे। सदियों पहले पूर्वज शिक्षादान के लिए असम गए थे।
बंगाल, असम क्षेत्र में जो लोग चटर्जी, मुखर्जी, बनर्जी आदि उपनाम लगाते हैं, उन सभी का ताल्लुक कन्नौज के कान्यकुब्ज वर्ग से है। सुनने में यह बात भले ही अटपटी लगे लेकिन इतिहासकार यही बताते हैं। माना जाता है कि मुगल और अंग्रेजी शासन काल के दौरान उनके पूर्वज यहां से देश के अलग-अलग हिस्सों में गए थे। इसीलिए उन्हें कान्यकुब्ज ब्राह्मण की संज्ञा दी जाती है।
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असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी खुद को कन्नौज का बताते हैं। इसका खुलासा खुद हिमंत ने असम की विधानसभा में किया था। कन्नौज के इतिहास के जानकार प्रवीण टंडन बताते हैं कि कन्नौज जब खुद में एक साम्राज्य था तो यह क्षेत्र काफी विकसित था।
शिक्षा क्षेत्र में भी यह इलाका अग्रणी था। वो मानते हैं कि अंग्रेजी शासन से पहले मुगल दौर में और उससे भी पहले कन्नौज से जुड़े अलग-अलग वर्ग और समुदाय के लोग देश के विभिन्न हिस्सों में शिक्षा के प्रसार, कारोबार और सुरक्षा के लिए बुलाए जाते थे।
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प्रवीण टंडन बताते हैं कि संयुक्त बंगाल के दौरान वर्मन राजवंश के शासक यहां आए से थे और विद्वान ब्राह्मणों को शिक्षा के लिए अपने राज्य में ले गए थे। इन कान्यकुब्ज और ब्राह्मणों को उन्होंने अपने राज्य के अलग-अलग हिस्सों में रखा।
ऐसे में समझा जाता है कि असम के मुख्यमंत्री के पूर्वज भी उसी दौर में यहां से गए होंगे। प्रवीण टंडन बताते हैं कि जो चटर्जी, मुखर्जी, बनर्जी आदि उपनाम लगाते हैं, उनका ताल्लुक भी कन्नौज के कान्यकुब्ज वर्ग से है।
असम से आए प्रतिनिधि मंडल ने तलाशी थीं जड़ें
सातवीं शताब्दी में सम्राट हर्षवर्द्धन के शासनकाल में कन्नौज एक बड़ा केंद्र था, इसलिए देश भर के लोग यहां आते थे। उनके साथ यहां के लोग जाते भी थे। उनमें से कुछ लोग वहीं जाकर बस गए।
डॉ. जीवन शुक्ला बताते हैं कि पिछले महीने असम से चार सदस्यीय एक प्रतिनिधिमंडल यहां आया था। उसमें एक कैबिनेट मंत्री, एक विधायक और एक पुलिस अधिकारी के अलावा एक सामाजिक कार्यकर्ता भी थीं। यह सभी लोग भी इसी विषय से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए यहां आए थे।
कन्नौज सांसद सुब्रत पाठक की ओर से अपने पिता की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में एक आयोजन उन लोगों को सम्मानित करने के लिए किया गया था, जिनके पूर्वजों का संबंध कन्नौज से रहा हो। इसमें असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का नाम शामिल था।
हलांकि वे शामिल नहीं हो सके थे। आमंत्रित होने वालों में बंगाल की सांसद लॉकेट चटर्जी, झारखंड के सांसद निशिकांत दुबे का भी नाम शामिल था। सांसद ने बताया था कि यह सभी कान्यकुब्ज हैं और इनकी जड़ें यहीं से जुड़ी हैं।
कायस्थ बिरादरी के घोष और दास उपनाम वाले लोग भी कन्नौज से ही
कन्नौज के इतिहास को करीब से जानने वाले और शहर के पीसीएम पीजी कॉलेज से रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. जीवन शुक्ला बताते हैं कि देश-विदेश में रह रहे कान्यकुब्ज ब्राह्मणों का सबसे बड़ा केंद्र कन्नौज ही है। ब्राह्मण अपने नाम के आगे अमूमन सरमा उपनाम का ही उपयोग करते हैं। चूंकि असम के मुख्यमंत्री भी अपने नाम के आगे सरमा लगाते हैं तो यह उनका अपने क्षेत्र के प्रति भावनात्मक लगाव ही है।
बंगाल में बनर्जी, बंदोपाध्याय, मुखर्जी, मुखोपाध्याय, चटर्जी, चटोपाध्याय उपनाम वाले ब्राह्मण भी कान्यकुब्ज हैं, इस नाते उन सभी की जड़ें कन्नौज में ही हैं। कायस्थ बिरारदी के घोष और दास उपनाम वाले लोग भी कन्नौज से ही ताल्लुक रखते हैं।
देश-विदेश में फैले हैं कान्यकुब्ज
ब्राह्मण वर्ग से जुड़े जो वाले और लोग खुद को कान्यकुब्ज बताते हैं उनकी जड़ें कन्नौज से ही जुड़ी हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा भी कान्यकुब्ज वर्ग से ताल्लुक रखते हैं। इसलिए वो खुद को असम का मूलनिवासी होने के बावजूद कान्यकुब्ज होने के चलते अपने पूर्वजों का जुड़ाव कन्नौज से मानते हैं। हालांकि कन्नौज में रहने वाले लोगों का कहना है कि उनके पूर्वज कब और किन परिस्थितियों में कन्नौज से असम गए इसका कोई तथ्यात्मक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।