अमुमन सभी का ख्वाब होता है कि आईआईटी मेंं पढ़ाई करने के बाद मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करेंगे या फिर विदेश में नौकरी करेंगे । लेकिन कानपुर आईआईटी के छात्र रहे आशीष गुप्ता ने कुछ और ही सोंच रखा था। कुछ ऐसा जो आज की भागती जिंदगी के लिए मिशाल है। ये है आशीष गुप्ता के जीवन के रोचक और प्रेरणादायक पहलू ।
आईआईटी कानपुर के इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के 1989 बैच के स्टूडेंट रहे आशीष गुप्ता आज एक सफल सोशल एंटरप्रिन्योर माने जाते हैं। आशीष ने सामर्थ्य नाम से एक नॉन-प्रॉफिट कंपनी खोली है। यह कंपनी बुजुर्गों के लिए काम करती है। 2016 में अस्तित्व में आई यह कंपनी देश के 60 शहरों में काम कर रही है और इससे 20 हजार से ज्यादा बुजुर्ग जुड़े हुए हैं।करोड़ों का टर्न ओवर है।
इसके पहले आशीष कई साल तक एजूकेशन सेक्टर में काम करते रहे। हालांकि तब भी वह बतौर सोशल एंटरप्रिन्योर ही काम करते रहे। देशभर में कई कॉलेज और यूनिवर्सिटी खुलवाईं। शैक्षिक व्यवस्थाओं को दुरुस्त कराया। रविवार को आशीष आईआईटी कानपुर में ई-समिट में बतौर वक्ता शामिल होने के लिए आए। अनौपचारिक बातचीत में आशीष ने सोशल एंटरप्रिन्योरशिप के बारे में कई जानकारी दी।
उम्र हुई तो समझा बुजुर्गों का दर्द
आशीष बताते हैं कि पहले वह एजूकेशन सेक्टर में ही काम करके खुश थे लेकिन जब अपने पिता की उम्र देखी और फिर खुद का ख्याल आया तो उनका मन बदल गया। बोले, खुद की उम्र होने पर समझ आई कि हम लोग घर में रहने वाले अपने पैरेंट्स को कितना इग्नोर करते हैं। बुजुर्ग हो चुके पैरेंट्स की कई ख्वाहिशें होती हैं। वह लोगों से मिलना चाहते हैं। उनसे बातचीत करना चाहते हैं और वह भी बाहर घूमना चाहते हैं लेकिन आजकल लोग इतना बिजी हो गए हैं कि घर के बुजुर्ग की इन जरूरतों का ख्याल ही नहीं रखते।
घर पर दी जाती हैं सुविधाएं
आशीष ने बताया कि कई ऐसे बुजुर्ग होते हैं जिनके बच्चे दूसरे शहर या देश में नौकरी करते हैं। ऐसे में वह घर में अकेले हो जाते हैं। ऐसे बुजुर्गों के लिए सामर्थ्य कम्युनिटी उनके घर में एक डेडिकेटेड मैनेजर रखता है। यह मैनेजर उनका ख्याल रखने का काम करता है। उन्हें दवाइयां खिलाता है। खाना खिलाने का काम करता है और उनकी हर जरूरतों को पूरा करता है। हालांकि इसके लिए 6000 रुपये प्रतिमाह का भुगतान करना पड़ता है।
कम्युनिटी में खुश हो जाते हैं बुजुर्ग
सामर्थ्य कम्युनिटी से जुड़ने वाले बुजुर्गों की समय-समय पर बैठकें होती हैं। इंटरटेनमेंट के आयोजन होते हैं। संगोष्ठियां होती हैं जहां वह अपनी बातों को रखते हैं। खुलकर एक-दूसरे से बातचीत करते हैं। इससे उनका मनोरंजन भी हो जाता है और उनका स्वास्थ्य भी ठीक रहता है। यह सुविधा बुजुर्गों को फ्री में दी जाती है।
-कंपनी खोल बुजुर्गों की सेवा कर रहा आईआईटीयन
-आईआईटी कानपुर से की पढ़ाई, सीनियर सिटीजन की कम्युनिटी बनाई