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Kanpur News: नन्हीं सांसों को बचाने के इंतजाम रेफर

Sun, 13 Sep 2026 01:01 AM IST
कानपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, कानपुर
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कानपुर देहात। जिला चिकित्सालय के महिला अस्पताल में गंभीर और बीमार नवजातों के इलाज की व्यवस्था संसाधनों की कमी से जूझ रही है। गंभीर नवजातों की संख्या क्षमता से 20 फीसदी अधिक होने पर एसएनसीयू से कई बार नवजात रेफर करने पड़ रहे हैं। वहीं, कुछ को परिजन स्वयं निजी अस्पताल ले जा रहे। ऐसा ही हाल आईसीयू का है। जहां चार वेंटिलेटर के सहारे सेवाएं चल रहीं हैं। हालांकि आईसीयू की क्षमता बढ़ाई जा रही हैं।
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महिला अस्पताल के दूसरे तल पर 18 बेड का विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाई (एसएनसीयू) संचालित है। यहां जन्म से लेकर 28 दिन तक के समय से पहले जन्मे, कम वजन, सांस लेने में दिक्कत और जन्मजात पीलिया समेत अन्य गंभीर बीमारियों से पीड़ित नवजातों को 24 घंटे जीवनरक्षक उपचार दिया जाता है। 18 बेड की क्षमता वाले एसएनसीयू में हर माह करीब 120 नवजात भर्ती हो रहे हैं। यानी बेड की क्षमता से लगभग 20 फीसदी अधिक भार है।
अधिक मरीज होने के कारण कई बेड पर एक साथ दो-दो नवजातों को भर्ती कर उपचार देना दिया जा रहा है। इससे गंभीर बच्चों की निगरानी और उपचार व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा। सबसे बड़ी समस्या जरूरी उपकरणों और जीवनरक्षक दवाओं की कमी है। कर्मियों के अनुसार नवजातों के ऑक्सीजन स्तर समेत अन्य महत्वपूर्ण शारीरिक मानकों की लगातार निगरानी के लिए मल्टीपैरामीटर पेशेंट मॉनीटर उपलब्ध नहीं हैं।
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वहीं, दवाओं और तरल पदार्थों की नियंत्रित मात्रा में आपूर्ति के लिए जरूरी सिरिंज पंप पांच ही है। सांस लेने में गंभीर परेशानी वाले नवजातों के उपचार में उपयोग होने वाली सी-पेप मशीन भी महज दो हैं। नवजातों की संख्या अधिक होने पर जरूरत के समय मशीन उपलब्ध नहीं हो पाती। ऐसे में गंभीर हालत वाले नवजातों को उच्चतर संस्थान के लिए रेफर करना पड़ता है। एसएनसीयू में सर्फेक्टेंट दवा की उपलब्धता न होना भी गंभीर नवजातों के इलाज में बड़ी बाधा बना हुआ है। अस्पताल से हर माह करीब 10 नवजातों को बेहतर उपचार के लिए उच्चतर संस्थान रेफर किया जाता है।
वहीं, दो से तीन बच्चों के परिजन उपचार की सुविधा पर्याप्त न होने पर लामा (लिव अगेंस्ट मेडिकल एडवाइस) करवाकर उन्हें निजी अस्पताल ले जाते हैं। शुक्रवार शाम को एसएनसीयू में एक किलोग्राम से कम वजन के दो नवजातों को भर्ती करवाया गया था। इसमें से एक नवजात के परिजन उसे लामा करवाकर साथ ले गए जबकि शनिवार को वार्ड में 18 बेड पर 20 बच्चे भर्ती मिले। एसएनसीयू प्रभारी डॉ. अवधेश कुमार ने बताया कि वार्ड में मशीनों व दवा की उपलब्धता को लेकर प्राचार्य को अवगत कराया गया है।
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बेड बढ़े पर संसाधन नहीं
महिला अस्पताल में पूर्व में 12 बेड का एसएनसीयू संचालित किया जा रहा था। मेडिकल कॉलेज बनने के साथ मरीजों की संख्या बढ़ी तो वार्ड की क्षमता बढ़ा कर 18 बेड कर दी गई थी। एसएनसीयू में मरीज लगातार बढ़ रहे हैं लेकिन उसके अनुरूप उपकरण और दवाओं की उपलब्धता नहीं बढ़ पाई है। ऐसे में गंभीर नवजातों के इलाज के लिए उच्चस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत है।
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क्यों है मल्टी पैरामीटर पेशेंट मॉनीटर की जरूरत
एसएनसीयू में मल्टी पैरामीटर पेशेंट मॉनीटर का प्रयोग बीमार और समय से पहले जन्मे बच्चों के ऑक्सीजन स्तर की 24 घंटे रियल-टाइम निगरानी की जाती है। मॉनीटर की रीडिंग देखकर डॉक्टर या नर्स तय करते हैं कि बच्चे को कितनी मात्रा में ऑक्सीजन देनी है। इन मॉनीटर्स में लो और हाई अलार्म सेट होते हैं। यदि शिशु का ऑक्सीजन स्तर 90-95% या डॉक्टर के निर्देशानुसार के दायरे से बाहर जाता है, तो अलार्म बज जाता है, जिससे तुरंत मेडिकल स्टाफ अलर्ट हो जाता है। यदि नवजात को संतुलित स्तर से कम ऑक्सीजन मिले तो हाइपोक्सिया व संतुलित स्तर से अधिक ऑक्सीजन दिए जाने पर हाइपर ऑक्सिया बीमारी का खतरा बढ़ जाता है। जोकि नवजात के मस्तिष्क, आंखों व अन्य अंगों के लिए खतरनाक होता है। इसके साथ ही रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेस सिंड्रोम, जन्म के समय दम घुटना और निमोनिया जैसी स्थितियों में यह मॉनीटर जीवन रक्षक साबित होता है।
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बयान ......
मेडिकल कॉलेज में सुविधाओं को बढ़ाने के साथ बेहतरीन चिकित्सा सेवाएं देने पर कार्य किया जा रहा है। एसएनसीयू में बेड बढ़ाए जाने से काफी हद तक मरीजों के रेफरल पर अंकुश लगा है। महत्वपूर्ण उपकरणों के लिए शासन से पत्राचार किया गया है। बजट मिलते ही उपकरण मंगवाए जाएंगे। सीपैप (कंटीन्यूअस पॉजिटिव एयरवे प्रेशर) मशीन अपने स्तर से लगवा रहे हैं। - डॉ. अंबरीश कुमार गुप्ता, प्राचार्य मेडिकल कॉलेज
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