उन्होंने बताया कि नई तकनीक के जरिये बीजों की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता में सुधार करने पर काम किया जाएगा। इसके लिए जीनोम एडिटिंग और प्रीडिक्टिव ब्रीडिंग तकनीक का इस्तेमाल होगा। दलहनी बीजों की डिजिटल कुंडली भी तैयार की जा रही है, जिससे उनके गुणों और उपयोग से संबंधित जानकारी आसानी से उपलब्ध हो सकेगी।
ब्रीडर को मिलेगा प्रोत्साहन
महानिदेशक ने बताया कि नई बीज प्रजाति विकसित करने वाले ब्रीडर को ढाई लाख रुपये और हाइब्रिड विकसित करने वाले ब्रीडर को पांच लाख रुपये दिए जाएंगे। इससे नई और बेहतर प्रजातियों के विकास के लिए शोधकर्ताओं को प्रोत्साहन मिलेगा।
कृषि, पोषण और स्वास्थ्य को जोड़ा जाएगा
उन्होंने बताया कि भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की ओर से साइंस एक्सीलेंस फॉर हेल्थ थ्रू एग्रीकल्चरल ट्रांसफॉर्मेशन (सेहत) मिशन चलाया जा रहा है। इसके जरिये कृषि, पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं को एक सूत्र में जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि भोजन को इस तरह विकसित करने पर जोर है कि शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्व भोजन से ही मिल सकें। इसके अलावा बायो पेस्टीसाइड्स और बायो फर्टिलाइजर को बढ़ावा दिया जा रहा है। किसानों को मिट्टी की जांच कराने के बाद ही जरूरत के अनुसार यूरिया और अन्य उर्वरकों का इस्तेमाल करने के लिए जागरूक किया जाएगा।