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Kanpur News: स्नातक के बाद अब परास्नातक कोर्सों की सीटें भरना चुनौती

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कानपुर। शहर के डिग्री कॉलेजों में स्नातक पाठ्यक्रमों में अभी तक छात्र कम हो रहे थे और अब यही हाल परास्नातक के पाठ्यक्रमों में भी दिख रहा है। कई कॉलेजों में परास्नातक के विभिन्न पाठ्यक्रमों की सीटें भरना मुश्किल हो गया है। स्थिति यह है कि कुछ पाठ्यक्रमों में 85 फीसदी तक सीटें खाली हैं। निजी कॉलेजों के साथ अनुदानित कॉलेजों में भी यही स्थिति बनी हुई है।
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छत्रपति शाहूजी महाराज विवि से संबद्ध 600 महाविद्यालयों में परास्नातक की हजारों सीटें हैं। शहर के प्रमुख कॉलेजों में भी परास्नातक पाठ्यक्रमों की सीटें पूरी तरह नहीं भर पाई हैं। डीएवी कॉलेज, डीबीएस कॉलेज, क्राइस्ट चर्च कॉलेज, पीपीएन कॉलेज और वीएसएसडी कॉलेज में विभिन्न परास्नातक पाठ्यक्रमों में सीटें खाली हैं। शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार स्नातक में विद्यार्थियों की संख्या कम होने पर उसका सीधा असर परास्नातक में प्रवेश लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या पर पड़ता है। इसके अलावा बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्नातक के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार आधारित पाठ्यक्रमों और दूसरे संस्थानों का रुख कर रहे हैं। इससे पारंपरिक विषयों में परास्नातक की मांग प्रभावित हो रही है।

हर सहाय डिग्री कॉलेज में इस साल परास्नातक में मात्र 25 दाखिले ही हुए हैं। कॉलेज में परास्नातक में केवल एमकॉम का संचालन होता है। इसमें 125 सीटें हैं लेकिन इस बार बेहद कम दाखिले हुए हैं। इसी तरह की स्थिति पिछले काफी सालों से बनी हुई है। प्राचार्य डॉ. अमर श्रीवास्तव का कहना है कि बच्चों का रुझान परास्नातक में कम हुआ है। अब छात्र रोजगारपरक कोर्स की तरफ बढ़ रहे हैं।
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डीएवी कॉलेज में परास्नातक की 3533 सीटें हैं जिसमें 808 सीटें ही भर पाई हैं। यह केवल 22 फीसदी है। संस्कृत की 70 सीटें हैं पर आठ दाखिले हुए हैं। एजुकेशन में 280 सीटों में 18 एडमिशन हुए हैं। पिछले कुछ सालों से यही स्थिति बनी हुई है। प्राचार्य प्रो. मनोज जौहरी का कहना है कि कॉलेज की एजुकेशन में काफी बदलाव की कोशिश की जा रही है। निश्चित ही अगले सत्र में परिवर्तन भी देखने को मिलेगा।


दाखिले कम होने के प्रमुख कारण
स्नातक स्तर पर ही विद्यार्थियों की संख्या में कमी
स्नातक के बाद रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी को प्राथमिकता
तकनीकी, व्यावसायिक और रोजगारपरक पाठ्यक्रमों की ओर बढ़ता रुझान
कई पारंपरिक विषयों में रोजगार के सीमित विकल्प की धारणा
दूसरे शहरों और विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए विद्यार्थियों का जाना
नई शिक्षा व्यवस्था के तहत विद्यार्थियों के बीच पाठ्यक्रमों के विकल्प बढ़ना
कुछ विषयों में विद्यार्थियों की रुचि लगातार कम होना

परास्नातक में लघु शोध की अनिवार्यता

नई शिक्षा नीति भी कम दाखिले का कारण
कुछ कॉलेजों की माने तो परास्नातक में छात्र संख्या कम होने का कारण नई शिक्षा नीति है। उनका कहना है कि छात्रों में अभी दो बार परीक्षा देने की प्रवृत्ति नहीं है। स्नातक तो किसी तरह कर भी लेते हैं लेकिन परास्नातक के कड़े नियमों के कारण भी वे दाखिला नहीं लेते। विवि के नियमों के अनुसार हर परास्नातक छात्र को लघु शोध जमा करना ही होता है, प्रैक्टिकल विषयों जैसे कला में कैनवास, रंगों की व्यवस्था स्वयं ही करनी पड़ती है। इस कारण भी छात्रों का रुझान कम होता जा रहा है।
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