चित्रकूट: कुख्यात डकैतों के चंगुल से सकुशल छूटकर परिजनों के पास पहुंचे रिटायर्ड वन कर्मी समेत तीनों अपहृतों की आंखों से खुशी के आंसू छलक उठे। जंगल से किस तरह घर पहुंचने की बात पूछते ही उनकी जुबान में भयवश ताला लग गया। चेहरे पर इतना भय कि जुबान से आवाज तक नहीं निकल रही थी। काफी देर बाद उन्होंने बताना शुरू किया कि दहशत के वो 58 घंटों में हर क्षण उनके आंखों के सामने मौत नाचती रही। तीनों का स्वास्थ्य भी खराब हो रहा था भरपेट भोजन व पानी नहीं मिल रहा था।
रिटायर्ड एसडीओ रामाश्रय पांडेय व रिटायर्ड लिपिक सुरेश त्रिपाठी ने बताया कि जानकीकुंड से आंख का इलाज कराने के बाद जब वह लौट रहे थे तो डाकूओं का सड़क पर आतंक चल रहा था। डकैत उनका नाम पता पूछकर पकड़कर जंगल ले गए। रातो रात करीब 25 किमी पैदल चलाकर पत्थरों के नीचे पहुंचे। वहीं पर दिन रात रहे। पहले छह डाकू थे दूसरे दिन बुधवार को दो और डाकू आए जिसमें एक को सभी भैया कह रहे थे। संभावना है कि वह डाकू बबुली था और जो पकड़कर ले गया था वह लवलेश था। अपहृतों ने बताया कि वह किसी को पहचानते नहीं हैं। पहले दिन डकैतों ने तीनों को डंडे से मारा पीटा लेकिन उसके बाद से एक भी बार नहीं मारा पीटा। बस मोबाइल से परिजनों से बातचीत कराकर फिरौती मंगाने को कहा। न पहुंचाने पर जान से मारने की धमकी दे रहे थे। अपहृतों ने बताया कि उनके आंख में दिन में एक बार पट्टी बांधी गई इसके बाद शाम होते ही हटा ली जाती थी।