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Kanpur News: विश्वविद्यालयों में गर्भ संस्कार पर नया पाठ्यक्रम होगा तैयार

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कानपुर। प्रदेश के विश्वविद्यालयों में गर्भ संस्कार पर पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा। इसमें यह पढ़ाया जाएगा कि मां के गर्भधारण करने से नौ महीने तक किस तरह की जीवन शैली रखनी चाहिए। इससे जच्चा-बच्चा मृत्यु दर में कमी आएगी। पैदाइशी दिव्यांग बच्चे भी नहीं होंगे। मां और बच्चे का कुपोषण से बचाव हो सकेगा। ये बातें दीक्षांत समारोह में कुलाधिपति आनंदी बेन पटेल ने कहीं।
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उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों में नया पाठयक्रम तैयार होगा। इससे प्रसव के समय होने वाली समस्याएं कम होंगी। उन्होंने कहा कि देश में चार प्रतिशत से ज्यादा दिव्यांग हैं। अल्ट्रासाउंड से गर्भस्थ शिशु की बीमारियां पता चल जाती हैं। बहुत सी गर्भवती महिलाओं की यह जांच नहीं होती है। मेडिकल अफसर को भी कुछ पता नहीं होता। जिला अस्पतालों में सीएसआर फंड से एक अल्ट्रासाउंड मशीन उपलब्ध कराई जाएगी। अगर गर्भस्थ शिशु में असाध्य खराबी हो तो उसे निकाल दिया जाए। उन्होंने उदाहरण दिया कि एक बच्चा पैदा हुआ तो उसका चेहरा ही नहीं था। डॉक्टर ने कहा कि 15-16 दिन जीवित रहेगा। तब तक पानी और दूध पिलाते रहें। 15 दिन बाद उसकी मौत हो गई। ऐसे शिशु को जन्म देने से कोई फायदा नहीं है।

इंटर फेल को विवि में मिलेगा रोजगार का प्रशिक्षण
कानपुर। हाई स्कूल और इंटर में फेल होने के बाद पढ़ाई छोड़ चुके युवाओं को विश्वविद्यालय में रोजगारपरक प्रशिक्षण मिलेगा। राज्यपाल आनंदी बेन पटेल ने इस संबंध में विवि प्रबंधन को प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू करने की सलाह दी। इससे युवाओं को कमाई का रास्ता मिलेगा। राज्यपाल ने कहा कि जिस अवधि में विश्वविद्यालय का कामकाज कम हो जाता है। भवन खाली रहते हैं। उस अवधि में प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किया जाए।
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हमने तो खर्च किया, बच्चे बचाएंगे पानी

माई सिटी रिपोर्टर



कानपुर। राज्यपाल आनंदी बेन ने पानी बचाने की नसीहत की। उन्होंने दीक्षांत समारोह की शुरुआत में ही पानी सहेजने का जिक्र किया। बोलीं कि छोटे बच्चे ही अब पानी बचाएंगे। हमने तो नहाने-धोने में पानी खर्च कर दिया। उन्हें पता है कि यह काम नहीं करेंगे तो पानी मिलेगा नहीं।

जल संरक्षण और स्वच्छता के क्षेत्र में काम करने वाली एक एनजीओ का जिक्र करके बोलीं कि एनजीओ वाले उनके पास आए। उनसे पूछा कि पानी कैसे बचाएंगे? इस पर कुछ बता नहीं पाए। लोग पानी भरकर लाते हैं। आधा पीते और आधा फेंक देते हैं। स्कूलों में छोटे बच्चों के लिए छोटा गिलास होना चाहिए। टंकी इतना नीचे रखें कि पानी आने पर अपने-आप भर जाए।
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