कानपुर। अलविदा जुमा में माहौल खराब करने की कोशिश करने वाले ‘परवेजियों’ के खिलाफ शहर में 10 साल से मुहिम चल रही है। यह ऐसा फिरका है जिसके खिलाफ बरेलवी और देवबंदी एकमत हैं। दोनों विचारधारा के मुफ्तियों ने इनके खिलाफ कुफ्र का फतवा जारी किया है। जमीअत उलेमा खासतौर पर ‘परवेजियों’ के खिलाफ ‘जेहाद’ छेड़े हुए है। मुसलिम बहुल क्षेत्रों में परवेजियों के खिलाफ बराबर जलसों का आयोजन तथा परचे वितरित किए जाते हैं। ‘परवेजी’ सिर्फ कुरान पाक की वकालत करते हैं और हदीस से इंकार करते हैं। इसी से दूसरे मुसलिम फिरके इनके खिलाफ हैं।
दारुल उलूम देवबंद और बरेली विचारधारा के मदरसा मंजर-ए-इसलाम के मुफ्तियों ने 2006 में ‘परवेजियों’ के खिलाफ कुफ्र का फतवा जारी किया था। इसके पहले भी इस फिरके के खिलाफ फतवे जारी हुए हैं। जमीअत उलेमा ने अपनी मुहिम 10 पहले शुरू की थी। इस साल 18 मार्च को रागेंद्र स्वरूप सेंटर सिविल लाइंस और तलाक महल में जलसा किया गया। इसमें ‘परवेजियों’ के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया था। यह मुहिम लगातार जारी है।
अब्दुल गफूर कुरैशी ने परवेजी फिरके की शुरुआत शहर में 7 साल पहले की थी। तीन साल पहले इस मुद्दे पर जमीअत उलेमा के प्रांतीय उपाध्यक्ष मौलाना मतीनुल हक ओसामा से 3 घंटे इस विचारधारा पर शास्त्रार्थ हुआ था। कोई निष्कर्ष न निकल पाने पर अगले हफ्ते फिर शास्त्रार्थ रखा गया। लेकिन इस दौरान कुरैशी की मौत हो गई। दरअस्ल परवेजी फिरके की शुरुआत पंजाब के अब्दुल्लाह चकरालवी ने 1915 में की थी। अदीब नियाज फतेहपुरी और आजमगढ़ के असलम जयराजपुरी इस विचारधारा से जुड़ गए। लेकिन तब तक यह फिरका गुमनाम था।
बाद में ब्रितानी हुकुमत में सेक्रेटरी के पद पर तैनात चौधरी गुलाम अहमद परवेज इसी विचारधारा से जुड़े। उनका मौलाना अबुल आला मौदूदी के जमाअत-ए-इसलामी से विरोध था। परवेज ने अपनी विचारधारा को लेकर लेखन शुरू कर दिया। इसी दौरान देश का बंटवारा हो गया। परवेज को पाकिस्तान में भी ऊंचा ओहदा मिला। परवेज ने मुहिम जारी रखी और इस विचारधारा से लोगों को जोड़ना शुरू किया। इसी से यह फिरका परवेजी कहलाने लगा। भारत में इसका मुख्यालय हैदराबाद में है।