कानपुर। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने विश्व के टॉप-200 शैक्षिक संस्थानों में भारत के एक भी संस्थान के शामिल न होने पर चिंता जताई है। शुक्रवार को आईआईटी कानपुर के 45वें दीक्षांत समारोह में उन्होंने कहा कि एक वक्त था जब भारत पूरे विश्व को ज्ञान बांटता था। तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय विश्वस्तरीय शिक्षा के केंद्र बिंदु थे। अब हम शक्तिशाली देश हैं, जहां टैलेंट की कमी नहीं है। इसके बावजूद विश्वस्तरीय शैक्षिक संस्थानों के मामले में हम पीछे हैं। यह ठीक नहीं है। अब टीचर, विज्ञानी, स्टूडेंट्स को आगे आना होगा। गुणवत्तापरक शिक्षा, शोध से भारत को विश्वस्तरीय शैक्षिक संस्थानों की सूची में शामिल कराने की बड़ी चुनौती हमारे सामने है। राष्ट्रपति ने शिक्षकों की कमी और विज्ञानियों को नोबेल पुरस्कार न मिलने को लेकर भी चिंता व्यक्त की।
दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने इन्फोसिस के एक्जीक्यूटिव चेयरमैन डॉ. एनआर नारायण मूर्ति और इलाहाबाद के हरिश्चंद्र रिसर्च इंस्टीट्यूट के प्रो. अशोक सेन को डॉक्टर ऑफ साइंस (डीएससी) की मानद उपाधि दी। फिर कहा कि आम आदमी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अब वैज्ञानिक प्रयोग पर ज्यादा जोर देना होगा। इसको लेकर भारत सरकार ने ‘टेक्नोलॉजी इनोवेशन पॉलिसी’ बनाई है। इसके तहत निजी क्षेत्र की कंपनियों को उच्च शिक्षा, शोध में बतौर निवेशक प्रेरित किया जा रहा है। कोशिश है कि आम आदमी को सस्ते और अच्छे उत्पाद सहज उपलब्ध हो जाएं। छोटी-बड़ी सभी समस्याओं का समाधान वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नए प्रयोग, शोध के जरिए ढूंढने की जरूरत है। जो देश तीसरी और 12वीं सदी तक उच्च शिक्षा में विश्व का मार्गदर्शन करता रहा हो, उसका विश्व के टॉप-200 शैक्षिक संस्थानों से बाहर होना चिंता का विषय है। राष्ट्रपति ने कहा कि पिछले 33 सालों से देश के किसी विज्ञानी को नोबेल पुरस्कार मिलने का इंतजार है। ऐसा नहीं है कि भारत में टैलेंट की कमी है। यहां से ग्रेजुएशन करके विदेश जाने और बढ़िया शोध करने वाले चार विज्ञानियों को नोबेल पुरस्कार मिल चुका है। इसका मतलब है कि गुणवत्तापरक शोध, शिक्षा से नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया जा सकता है। इसका प्रयास विज्ञानियों को करना चाहिए। राष्ट्रपति ने शैक्षणिक व्यवस्था की बड़ी खामी के रूप में शिक्षकों की कमी को उजागर किया। कहा, कि जरूरत विज्ञान, तकनीक के सकारात्मक प्रयोग की है। तकनीक के जरिए अच्छे शिक्षकों की कमी पूरी की जा सकती है। इसका सीधा माध्यम वीडियो कान्फ्रेंसिंग, विजुअल टीचिंग एड है। चिकित्सा, शिक्षा, गरीबी और ऐसी अन्य कई समस्याओं का समाधान भी विज्ञान में ढूंढना होगा। इसके लिए टेक्नोक्रेट्स के साथ ही निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों को आगे आना चाहिए। अब शोध के क्षेत्र में बड़े निवेश की जरूरत है। राष्ट्रपति ने मेडल, डिग्री पाने वाले आईआईटियंस को भी जिम्मेदारी का एहसास कराया। कहा कि आपके सामने भूख, बीमारी और अशिक्षा की चुनौती आएगी। इसका समाधान करने की कोशिश जरूर करें। विज्ञान, तकनीक पर काम करें, जिसका इस्तेमाल देश, समाज के लिए होना चाहिए। आईआईटियंस समस्याओं में शामिल होने की आदत डालें। गलत का साथ कभी न दें। जो गलत हो, उसका खुला विरोध करें। इस उम्मीद में न रहें कि बदलाव आएगा। बदलाव के लिए कठिन परिश्रम जरूर करते रहें।
उच्च शिक्षा में बहुत पीछे है देश
राष्ट्रपति ने वैश्विक आंकड़ों के जरिए उच्च शिक्षा में देश के पिछड़ेपन को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, 18 से 24 वर्ष के आयु वर्ग वाले बहुत कम युवा उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। अमेरिका में प्रति हजार व्यक्ति जहां यह औसत 34 का है, जर्मनी में 21 वहीं भारत में 7 ही है। 12वीं पंचवर्षीय योजना में इसे बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।
डॉन्ट रन अवे फ्रॉम ए नॉइजी डेमोक्रेसी
कानपुर। सम टाइम्स डेमोक्रेसी लाइक अवर्स टर्न इन टू नॉइजी डेमोक्रेसी। डॉन्ट रन अवे, एंगेज इन इट एंड फाइंड दि सॉल्यूशन (कई बार हमारे देश का लोकतंत्र समस्याओं और चुनौतियों के चलते चिल्ल पौं वाला लोकतंत्र बन जाता है। सब कुछ बेकार है कह कर विदेश भागने के बजाय उसका हिस्सा बनें, समस्याओं को समझें और उनका समाधान ढूंढें)। विदेशी चकाचौंध से आकर्षित होने वाले आईआईटी के युवाओं को कुछ इस अंदाज में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने नसीहत दी। कहा कि देश के निर्माण में हर नागरिक का योगदान होता है। आईआईटी जैसा संस्थान बनाने में बड़े लोगों के साथ ऐसे गरीब मजदूरों का भी सहयोग है जो भूख, बीमारी, कुपोषण से जूझते हैं। इसलिए अपने जीवन के हर मोड़ पर ऐसी समस्याओं का समाधान करने का जज्बा और लक्ष्य हर स्टूडेंट के मन में होना चाहिए।
तकनीक, उद्योग की खाई पाटें युवा इंजीनियर
कानपुर। विशिष्ट अतिथि के रूप में आईआईटी कानपुर के दीक्षांत समारोह में हिस्सा लेने आए उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बीएल जोशी ने कहा कि युवा इंजीनियरों को अब तकनीक, उद्योग की खाई पाटनी चाहिए। अब आधुनिक तकनीक के सकारात्मक प्रयोग की जरूरत है। उन्होंने इन्फोसिस के डॉ. एनआर नरायणमूर्ति को इंजीनियरों का रोल मॉडल बताया। कहा कि मूर्ति ने बहुत कम पूंजी से आईटी कंपनी की शुरुआत कर उसे विश्व की अग्रणी आईटी कंपनी बनाया। उन्होंने सच्चाई, ईमानदारी और नैतिकता की बेजोड़ मिसाल कायम की। इंडस्ट्री के हर इंजीनियर को ऐसी शख्सियत से प्रेरणा लेनी चाहिए। साथ ही उन्होंने इलाहाबाद के प्रो. आनंद सेन के विज्ञान जगत में योगदान की सराहना की। कहा कि विज्ञान की नवीनतम खोजों का लाभ स्टूडेंट्स के साथ ही उद्योग और उसके माध्यम से आम उपभोक्ताओं तक पहुंचे, तभी प्रयास सार्थक होगा।