कानपुर। श्री गुरु नानक देवजी महाराज के प्रकाशोत्सव पर मोतीझील में बुधवार को 11.30 बजे से लंगर का आयोजन होगा। लंगर में 2.5 लाख लोगों के लिए प्रसाद तैयार किया जा रहा है। इसकी तैयारी मंगलवार से ही शुरू हो गई। तैयारी में बच्चे, महिलाएं, पुरुष और बूढे़ सभी जुटे थे। कोई रोटी बेलने में लगा तो कोई सब्जी काटने में जबकि युवा इन लोगों को पानी और चाय पिलाने में लगे थे।
लंगर इंचार्ज मंजीत सिंह सागरी ने बताया कि लंगर के लिए 150 कुंतल आटा, 40 कुंतल दाल, 40 कुंतल आलू और गोभी, 20 ड्रम आचार की व्यवस्था की गई है। इसके अलावा समाज की लोग अपने-अपने घरों से रोटी लेकर आएंगे। उन्होंने बताया कि लंगर के लिए गोविंद नगर चार ब्लाक, गोविंद नगर 11 ब्लाक, रंजीत नगर गुरुद्वारा, रतनलाल गुरुद्वारा, पांडु नगर गुरुद्वारा में भी रोटी सेंकी जा रही है। जो रात में मोतीझील लाई गई। एक पंगत में करीब 10 हजार लोग बैठकर लंगर छकेंगे। पुरुषों की लाइन रॉयल क्लिफ से लगेगी जबकि महिलाओं की लाइन नगर निगम कार्यालय के सामने से। उधर, श्री गुरु सिंह सभा शास्त्री नगर काली मठिया में लंगर का प्रसाद तैयार किया गया। बड़ी संख्या में संगत यहां सेवा करने पहुंची। इस दौरान तेजेंदर पाल सिंह, सतपाल सिंह, अमृतपाल सिंह, रंजीत सिंह मौजूद रहे।
मैं लंगर में पहली बार सेवा करने आई हूं। पिछली बार अखबार में लंगर के बारे में पढ़कर अपने दोस्तों से तय कर लिया था कि लंगर में सेवा करने चलेंगे। यहां पर आकर काफी अच्छा लगा।
-ऋतु मेहरा, तिलक नगर
मैं अपने दोस्त के साथ यहां पर आई हूं। यहां का माहौल देखकर मैं चकित हूं। हर कोई सेवा कर रहा है। चाहे बच्चे हाें या महिलाएं। किसी में भेदभाव नहीं है। ऐसा नजारा मैंने पहली बार देखा।
-नेहा गुप्ता, सिविल लाइंस
लंगर का मतलब, संगत और पंगत
प्रकाश उत्सव पर लंगर की प्रथा श्री गुरु नानक देवजी महाराज ने शुरू की थी। उन्होंने पहली बार 14 साल की उम्र में कुछ फकीरों को पंगत में बैठाकर भोजन कराया था। इसके पीछे उनका मकसद था कि समाज में ऊंच नीच खत्म हो। महेंदर सिंह बिंदा ने बताया कि लंगर का शब्दिक अर्थ संगत और पंगत है। संगत से मतलब है गुरुद्वारे व अन्य धार्मिक अवसरों पर आने वाले महिलाओं और पुरुषों की भीड़ से, जो श्री गुरु ग्रंथ साहब के सामने सिर झुकाए और पंगत में बैठकर प्रसाद ग्रहण करे।
अच्छे कार्यों के लिए दिया जाता है ‘सिरोपा’
प्रकाशोत्सव पर विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वालों को सिरोपा देकर सम्मानित किया जाता है। पहली बार सिखों के दूसरे गुरु अंगद देवजी ने गुरु अमृतदास जी को उनके अच्छे कार्यों के लिए सिरोपा देकर सम्मानित किया था। लालबंगला निवासी गुरुदेव सिंह ने बताया कि सिरोपा का मतलब सम्मान होता है।
श्री गुरु ग्रंथ सािहब में है गुरुओं की वाणी
श्री गुरु नानक देव जी से लेकर गुरु गोबिंद सिंह जी तक 10 गुरु हुए हैं। गुरु गोबिंद सिंहजी ने सन 1604 में श्री गुरु ग्रंथ साहिबजी को गुरु का दर्जा दिया था। लुधियाना के ज्ञानी रणविंदर सिंह ने बताया कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब में हर जाति के धर्म गुरुओं के उपदेशों को संकलित किया गया है। इसमें 15 संतों समेत 6 गुरु साहिबजी की वाणी है। गुरु अर्जन देवजी ने और बाद में गुरु गोविंद सिंहजी ने गुरु तेग बहादुर साहबजी की वाणी को शामिल किया था। इसमें 5559 गुरुवाणी और शबद हैं।