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देश में पहली बार बनेंगे, अभी रूस से होते हैं आयात

Fri, 12 Oct 2012 12:00 PM IST
Kanpur
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कानपुर। शहर की पैराशूट फैक्ट्री में ‘हैवी ड्रॉपिंग पैराशूट’ बनाने की तैयारियां शुरू हो गईं हैं। शुरुआत में दो ट्रायल वर्जन बनाए जाएंगे। परीक्षण में खरे उतरने पर इनका बड़े पैमाने पर उत्पादन होगा। ये पैराशूट 15 टन तक भार सुरक्षित तरीके से नीचे ला सकने में सक्षम होंगे। अभी तक ‘हैवी ड्रॉपिंग पैराशूट’ रूस से आयात किए जाते हैं।
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हवाई रास्ते से दुर्गम स्थानों तक जीप, एंबुलेंस, टैंक, मिसाइल के पार्ट्स आदि भारी उपकरण पहुंचाने के लिए सेना ‘हैवी ड्रॉपिंग पैराशूट’ का इस्तेमाल करती है। मालवाहक जहाजों से भारी उपकरण निर्धारित स्थानों पर पहुंचाने के लिए भी इन पैराशूटों का इस्तेमाल होता है। काफी समय से इन्हें देश में बनाने की तैयारियां हो रही थीं। रक्षा मंत्रालय की लैब डीआरडीओ ने आगरा स्थित एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट स्टैबलिशमेंट (एडीआरडीई) को इस संबंध में रिसर्च का काम सौंपा था। तमाम रिसर्च के बाद अब इसका डिजाइन व अन्य ब्योरा तैयार करके पैराशूट फैक्ट्री को भेजा गया है।
फैक्ट्री के अधिकारियों ने बताया कि शुरुआत में इसके दो सैंपल तैयार किए जाएंगे। इसका ट्रायल होगा। ट्रायल में पास होने के बाद इनका उत्पादन शुरू हो जाएगा। इस काम में करीब एक साल लगेगा।
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इनसेट---
ऐसा होगा पैराशूट
पैराशूट को पी-7 नाम दिया गया है। यह 60 फुट ऊंचा होगा। इसके लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कपड़ा कॉटन और पॉलिस्टर के मेल से बनाया जाएगा। ये पैराशूट कई चरणों में खुलते हैं। 12-15 टन तक वजनी सामान सुरक्षित नीचे पहुंचा सकते हैं।

भीतर शेष के साथ---
चाइना बॉर्डर में हुआ था इस्तेमाल
कानपुर। कुछ समय पूर्व चीन द्वारा भारतीय सीमाओं में घुसपैठ की खबर पर बॉर्डर पर बनाई गई चौकियों के लिए असलहा, वाहन समेत अन्य आवश्यकताओं को इसी पैराशूट के जरिए पूरा किया गया था। इसके जरिए टैंक के हिस्से भी गिराए जाते हैं जिन्हें नीचे असेंबल कर लिया जाता है।
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