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UP: कानपुर जेल से दो साल में ‘आजाद’ हुए 750 बंदी, 16 साल में पहली बार दो हजार से नीचे आई बंदियों की संख्या

Mon, 06 Jan 2025 02:13 PM IST
शिखा पांडेय मनीष निगम, अमर उजाला, कानपुर

सार

कानपुर जेल में सरकार की पहल और सुप्रीम कोर्ट की गाइड लाइन का प्रभाव दिखा। कानपुर जेल से दो साल में 750 बंदी आजाद हुए। 16 साल में पहली बार बंदियों की संख्या 2000 से नीचे आई।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ani
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विस्तार
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गरीब और मजबूरों के लिए जेल अभिशाप से कम नहीं है। खास तौर से ऐसे बंदियों के लिए जो अपना मुकदमा लड़ने के लिए अधिवक्ता तक नहीं कर पाते, उनके लिए जेल से बाहर निकलना संभव नहीं है। ऐसे बंदियों की वजह से कानपुर की जेल हमेशा क्षमता से ज्यादा कैदियों के बोझ को ही ढोती आई है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट और सरकार की नई कवायद के चलते सोलह साल में ऐसा पहली बार हुआ है कि जेल में कैदियों की संख्या दो हजार से कम हो गई है।
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जिला विधिक सेवा प्राधिकरण और जेल प्रशासन की सक्रियता से ऐसे बंदी जेल से आजाद हो रहे हैं जिनकी सजा पूरी होने के बावजूद जुर्माना राशि जमा न कर पाना आजादी में आड़े आ रहा था। पिछले दो साल की बात करें तो जिला कारागार से 750 गरीब बंदी रिहा किए गए जो अब तक का रिकॉर्ड है। इनकी रिहाई का प्रभाव ही है कि 16 साल बाद जेल में बंदियों की संख्या दो हजार से नीचे पहुंच गई। जेल सूत्रों के मुताबिक दिसंबर 2008 में जेल में बंदियों की संख्या 1980 थी। वर्तमान में यह संख्या 1950 है। यह आंकड़ा तो केवल कानपुर का ही है लेकिन यही हालत प्रदेश के तमाम जेलों की है। प्रदेश की तमाम जेलों में क्षमता से ज्यादा बंदी थे, लेकिन इधर दो साल से सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद बंदियों की संख्या कम हो गई है।

केस एक - जूही निवासी राजीव पर पुलिस ने लूट की रिपोर्ट दर्ज कर जेल भेजा था। अधिवक्ता न होने के चलते लीगल एंड डिफेंस काउंसिल की टीम ने मुकदमा लड़ा। साक्ष्यों के अभाव में 13 अगस्त 2024 को अपर सत्र न्यायाधीश कोर्ट संख्या तीन से उसे बरी कर दिया गया। राजीव करीब 21 महीने जेल में रहा।

केस दो - बर्रा निवासी धीरज उर्फ प्रवेश कठेरिया को दो साल एक माह की कैद और सात हजार रुपये जुर्माने से दंडित किया था। धीरज न तो जमानत देने में सक्षम था और न ही जुर्माना जमा करने में। निजी संस्था ने जुर्माना जमा किया। इसके बाद उसे जेल से रिहा किया गया।

केस तीन - जाजमऊ निवासी फहीम को कोर्ट ने तीन साल की सजा सुनाई थी। साथ ही 21 हजार रुपये का जुर्माना लगाया गया था। तीन साल की सजा काटने के बाद जेल प्रशासन ने निजी संस्था की मदद से 21 हजार रुपये जुर्माना जमा कराया। इसके बाद उसे रिहाई मिल सकी।

दो साल पहले कानपुर जेल में थे 27 सौ से ज्यादा बंदी
जेल अधीक्षक डा.बीडी पांडेय बताते हैं कि दो साल पहले जब उन्होंने जेल अधीक्षक का कार्यभार संभाला था। तब बंदियों की संख्या 2700 से ज्यादा थी। इन दो सालों में हर सप्ताह लगने वाली लोक अदालत में बंदियों के मामले निपटाए गए। जिला विधिक सेवा प्राधिकरण से बंदियों को पैरवी के लिए अधिवक्ता दिलाए गए। स्वयं सेवी संस्थाओं की मदद से बंदियों का जुर्माना अदा कराकर उन्हें रिहा कराया गया। इन सब प्रयासों से 750 बंदियों को रिहाई दिलाई गई।

लीगल एड डिफेंस काउंसिल की टीम कर रही काम
शासन ने गरीब बंदियों की मदद के लिए लीगल एड डिफेंस काउंसिल की छह सदस्यीय टीम गठित की है। चार मई 2024 से यह टीम लगातार काम कर रही है। गरीब बंदियों की रिहाई, उनकी पेशी, जमानत और जुर्माना भरने में मदद कराना टीम का काम है। चीफ लीगल एड डिफेंस काउंसिल अखिलेश कुमार बताते हैं कि पिछले सात महीने में उनकी टीम ने 135 से ज्यादा बंदियों की मदद की है।

 

जेल की क्षमता 1245
जेल में बंदियों को रखने की क्षमता 1245 है। बावजूद इसके यहां 2009 के बाद से बंदियों की संख्या 2300 से कम कभी नहीं रही। कोविड के दौरान मार्च 2021 में यह संख्या सबसे अधिक 2868 पहुंच गई थी।

इस तरह से हो रही मदद
- जिला विधिक सेवा प्राधिकरण की ओर से गरीब बंदियों को अधिवक्ता मुहैया कराए जाते हैं
- लोक अदालत में लघुवाद से संबंधित मुकदमों का निस्तारण कराया जाता है
- स्वयं सेवी संस्थाओं की मदद से जुर्माना राशि जमा कराकर रिहाई कराई जा रही है

 
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बंदी कम होने से इन चीजों पर पड़ा प्रभाव
- भोजन और दवा पर होने वाला खर्च
- बंदियों के रहने और सोने की हुई सुविधा
- आसानी से होने लगी मिलाई
- अधिकारियों के निरीक्षण में लगता है कम समय
- ज्यादा बंदियों से जेल प्रशासन कर सकता है बात
- कम बंदी होने की वजह से रख सकते हैं ज्यादा ध्यान।
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