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स्मृति शेष: 34 साल पहले शहरवासियों को दीवाना बना गए थे जाकिर, दो बार आए थे शहर…सुनने-देखने के लिए लगी थी होड़

Tue, 17 Dec 2024 11:07 AM IST
हिमांशु अवस्थी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, कानपुर

सार

Kanpur News: मशहूर तबला वादक उस्ताद जाकिर हुसैन के निधन की खबर ने शहर के कलाकारों व संगीत प्रेमियों को स्तब्ध कर दिया है। सभी इसे संगीत के क्षेत्र के लिए बड़ी क्षति बता रहे हैं। उस्ताद जाकिर हुसैन दो बार शहर आ चुके हैं।
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उस्ताद जाकिर हुसैन - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कानपुर में मशहूर तबला वादक जाकिर हुसैन की दीवानगी शहरवासियों पर भी सिर चढ़कर बोल चुकी है। वह अपनी संगीत यात्रा के दौरान अब तक दो बार महानगर आए। रविवार को देर शाम आई उनके निधन की सूचना से यहां के संगीत प्रेमियों को मायूस कर दिया। लोगों ने इसे संगीत के क्षेत्र में बड़ी क्षति बताया।

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जाकिर हुसैन पहली बार सन 1990 में यहां आए। इस दौरान उन्होंने यहां आयोजित प्रमुख कार्यक्रमों में हिस्सा लिया। तबले की थाप के साथ उन्होंने अपनी अदायगी से भी लोगों का दिल जीत लिया था। उन्होंने यहां के संगीत प्रेमियों का तहे दिल से अभिवादन भी किया था।

1981 में मोतीझील में किया गया था आयोजन
शहर के वरिष्ठ तबला वादक हरीश कुमार झा के अनुसार कानपुर के संगीत प्रेमियों के लिए वह एक यादगार शाम रही, जब उस्ताद जाकिर ने अपने जादुई वादन से शहर को झूमने पर मजबूर कर दिया। 1981 में मोतीझील में नाद ब्रह्ममन संस्था की ओर से कार्यक्रम का आयोजन किया गया था।

हर कोई उन्हें सुनने और देखने के लिए आतुर था
हरीश बताते हैं कि उन दिनों वह छात्र जीवन में थे, लेकिन तबले पर उस्ताद के उंगलियों की थाप अभी भी दिल-ओ दिमाग में कायम है। बताया कि उस्ताद हुसैन का वादन शुरू होते ही पूरा वातावरण संगीतमय हो गया। बताया कि उस समय हर कोई उन्हें सुनने और देखने के लिए आतुर था।

दोनों की जुगलबंदी से गजब का समां बंध गया था
उन्हें यहां पर बुलाने का श्रेय यूपीएसआईडीसी के डॉ. वर्धराजन को जाता है। उनके साथ प्रसिद्ध संतूर वादक शिव कुमार शर्मा भी आए थे। दोनों की जुगलबंदी से गजब का समां बंध गया था। इसी तरह दूसरी बार कैंट क्षेत्र में बीआईसी भवन में संगीत के कार्यक्रम में उनका आना हुआ था। उसके बाद कभी नहीं आए।

मेरे बड़े भाई आशीष झा से उनकी मुलाकात होती रहती थी। वे जिस भी कार्यक्रम में जाते तो चार चांद लग जाते। कार्यक्रम के दौरान मैंने उन्हें प्रणाम किया था। उन्हीं को सुनकर हमने सीखा है।  -हरीश कुमार झा, वरिष्ठ तबला वादक

पद्मविभूषण उस्ताद ज़ाकिर हुसैन का महाप्रयाण संगीत जगत के लिए अपूर्णीय क्षति है। शास्त्रीय संगीत के कलाकार होते हुए भी बच्चे-बच्चे की जुबां पर उनका नाम है। कला में पारंगत होने के साथ ही वह विनम्र व्यक्तित्व के भी धनी थे। उनका जाना संगीत प्रेमियों के लिए सदमे से कम नहीं है। भविष्य में उनके स्थान की भरपाई होना असंभव सा प्रतीत होता है।  -पं. विनोद कुमार द्विवेदी ,ध्रुपद गायक

उस्ताद ज़ाकिर हुसैन हर वर्ग के साधकों के प्रेरणा स्रोत थे। उनके जैसा रचनात्मक संगीतज्ञ मिलना अत्यंत दुर्लभ है। तबले एवं भारतीय शास्त्रीय संगीत को वैश्विक पहचान दिलाने में उनका अहम योगदान था।  -आयुष द्विवेदी, ध्रुपद गायक, आकाशवाणी दूरदर्शन कलाकार
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उनके जैसा अद्भुत कलाकार आज के समय में मिलना बहुत कठिन है। उस्ताद के व्यक्तित्व से अच्छा कलाकार ही नहीं बल्कि अच्छा इंसान बनने की भी प्रेरणा मिलती है। वह अपने संगीत से हमारे बीच में हमेशा रहेंगे।  -राजीव सक्सेना, वरिष्ठ गजल गायक
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