कन्नौज। फाइलेरिया से बचने के लिए एक दो साल नहीं बल्कि लगातार तीन साल तक दवा खानी होगी। फाइलेरिया रोग उन्मूलन कार्यक्रम कोविड-19 संक्रमण को ध्यान में रखकर मनाया जाएगा। फाइलेरिया व हाथी पांव रोग से बचाने के लिए 21 दिसंबर से अभियान की शुरुआत हो रही है, जो आठ जनवरी तक चलेगा। इस अभियान को हर हाल में सफल बनाया जाएगा। प्रशासन समेत स्वास्थ्य विभाग ने इसकी तैयारी पूरी कर ली है।
अभियान के नोडल अधिकारी डा. केसी राय ने बताया कि मास ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एमडीए) कार्यक्रम सोमवार से शुरू होगा। बताया कि इस अभियान में सभी वर्गों के लाभार्थियों को फाइलेरिया से सुरक्षित रखने के लिए डीईसी और अल्बेंडाजोल की निर्धारित खुराक प्रशिक्षित स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर अपने सामने मुफ्त खिलाएंगे। किसी भी स्थिति में दवा का वितरण नहीं किया जाएगा। दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती महिलाओं और अति गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को ये दवाएं नहीं खिलाई जाएगी।
डा. राय ने बताया कि रक्तचाप, शुगर, अर्थराइटिस या अन्य सामान्य रोगों से ग्रसित व्यक्तियों को ये दवाएं खानी है। सामान्य लोगों को इन दवाओं के खाने से किसी भी प्रकार के दुष्प्रभाव नहीं होते हैं। यदि किसी को दवा खाने के बाद उल्टी, चक्कर, खुजली या जी मिचलाने जैसे लक्षण होते हैं तो यह इस बात का प्रतीक है कि उस व्यक्ति के शरीर में फाइलेरिया के कीटाणु मौजूद हैं, जोकि दवा खाने के बाद कीटाणुओं के मरने के कारण उत्पन्न होते हैं। फाइलेरिया या हाथीपांव रोग, सार्वजनिक स्वास्थ्य की गंभीर समस्या है। यह रोग मच्छर के काटने से फैलता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्लूएचओ) के अनुसार फाइलेरिया, दुनिया भर में दीर्घकालिक दिव्यांगकता के प्रमुख कारणों में से एक है। आमतौर पर बचपन में होने वाला यह संक्रमण लिम्फैटिक सिस्टम को नुकसान पहुंचाता है। यदि इसका इलाज न किया जाए तो इससे शारीरिक अंगों में असामान्य सूजन होती है। फाइलेरिया के कारण चिरकालिक रोग जैसे हाइड्रोसील (अंडकोष की थैली में सूजन), लिम्फोएडेमा(अंगों की सूजन) व काइलुरिया (दूधिया सफेद पेशाब) से ग्रसित लोगों को अक्सर सामाजिक बोझ सहना पड़ता है। इससे उनकी आजीविका व काम करने की क्षमता भी प्रभावित होती है।
फाइलेरिया उन्मूलन अभियान के सफल क्रियान्वयन के लिए ग्राम स्तर पर ग्राम प्रधानों के सहयोग से सोशल मोबिलाइजेशन से संबंधित गतिविधियां अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इनकी निगरानी में अभियान चलेगा। समुदाय में जागरुकता फैलाने के लिए आशा और आंगनबाडी कार्यकर्ता के माध्यम से घर-घर जाकर दवा खिलाई जाएगी। साथ ही स्थानीय स्कूलों के बच्चों के माध्यम से प्रचार-प्रसार किया जा सकता है।