प्रकाश पर्व के रूप में मनाए जाने वाले दीपावली के
पौराणिक महत्व के साथ वैज्ञानिक महत्व भी है। दीपावली पर घरों में सैकड़ों
दीपक जलाने की परंपरा है, पर इसके पीछे डाक्टरों का मत है कि दीया जलाने से
बाहरी रेडिएशन खत्म हो जाता है।
दीपावली की शुरुआत धनतेरस से हो जाती
है।
इस दिन घरेलू उपयोग की वस्तुओं के अलावा लोग नारियल की झाड़ू खरीदते
हैं। कहा जाता है कि झाड़ू घर में लाने से सुख, समृद्धि और लक्ष्मी आती है।
दीपावली के दिन पूजा पाठ के बाद तेल के दीये की लौ से काजल बनाया जाता है,
जिसे परिवार का हर सदस्य लगाता है, पर वह मान्यता भी अब कुछ ही घरों में
देखने को मिलती है।
यही हाल तेल के दीये का है। मान्यता के साथ कई प्रकार
से गुणकारी दीयों की जगह अब रंग-बिरंगी चाइनीज झालरों ने ले ली है। पहले
घरों में मिट्टी के दीपक तेल की बाती से जलाते थे, पर धीरे-धीरे परंपरा
लुप्त होती जा रही है। अब लोग अपने घरों को रोशन करने के लिए दीयों की जगह
मोमबत्ती और चाइनीज झालरों का प्रयोग करने लगे हैं।
घर के बुजुर्गों का
कहना है कि मिट्टी के दीये जलाने से एक तो आसपास का वातावरण सही रहता है।
इसके साथ ही बरसाती कीट पतंगे भी जलकर नष्ट हो जाते हैं। इस बाबत सीएचसी के
चिकित्साधिकारी डा. दिवाकर श्रीवास्तव बताते हैं कि दीया जलाने से उसके
चारों ओर ऊर्जा चक्र बन जाता है जो बाहरी रेडिएशन को रोकता है।
बरसात के
मौसम के बाद दीपावली आती है। ऐसे में मकानों में जो नमी होती है इससे
कीड़े-मकौड़े और फंगस घरों में पैदा हो जाते हैं। जब एक साथ काफी दीये जलते
हैं तो उसकी ऊर्जा से घरों की नमी नष्ट हो जाती है। दीये की लौ से जो
कार्बन डाई आक्साइड एकत्र होती है उससे भी कीटाणु नष्ट हो जाते हैं।