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Kannauj News: नम आंखों से कर्बला में ताजिए दफन

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न्नौज। मुहर्रम की 10 तारीख यानी यौम-ए-आशूरा। कर्बला की जंग में पैगम्बर मोहम्मद के नवासे की शहादत। सच और हक के लिए पूरे कुनबे ने कुर्बानी दे दी पर सिर नहीं झुकाया। उन्हीं की याद में रविवार को जिलेभर में गम का इजहार किया गया। नम आंखों से हाजी शरीफ के पास कर्बला में ताजिए दफन किए गए।
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इस्लामी कैलेंडर में मुहर्रम का महीना पहला महीना होता है। अब से डेढ़ हजार साल पहले कर्बला के मैदान में सच और झूठ की लड़ाई में हजरत मोहम्मद साहब के नवासे ने अपने पूरे कुनबे के साथ कुर्बानी दे दी थी। पहली मुहर्रम से शुरू हुई जंग का सिलसिला 10 तारीख मुहर्रम तक चला था। शुरू में तो कुनबे से जुड़े लोगों का उत्पीड़न किया गया। उन्हें शहीद होना पड़ा। 10 तारीख मोहर्रम को खुद हजरत मोहम्मद साहब के नवासे इमाम हुसैन ने कुर्बानी दे दी नी सिर नहीं झुकाया।
इंसानियत को बचाने के लिए और ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाते हुए उन्होंने सिर नहीं झुकाया और पूरी दुनिया के सामने नजीर पेश की। हुसैन के चाहने वालों ने सड़क पर उतर कर जंग और उसमें दी गई कुर्बानी को याद किया। इस दौरान अकीदतमंदों ने आंसू बहाते हुए शहादत को याद किया। करतब दिखाए गए। ताजिया निकाला गया। चौकी उठी। मातम में मर्सिया पढ़ा गया। शहीदों को याद किया गया। शहीदों की कुर्बानी से सबक लेकर सच्चाई के रास्ते पर चलने की बात कही गई। गलत और झूठ के आगे सिर न झुकाने की नसीहत मिली। जुलूस में शामिल लोगों ने कर्बला की जंग से मिले सबक पर अमल करने की हिदायत दी।
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मातमी माहौल से इत्रनगरी गमगीन
मुहर्रम की 10 तारीख को निकाले गए जुलूस में कर्बला के शहीदों को याद करते हुए इत्रनगरी गमगीन हो गई। मीरा टोला और जामा मस्जिद से ताजिया जुलूस निकला। अहमदी टोला, सैय्यद बजरिया से भी जुलूस निकला। शहर में अलग-अलग जगहों से होकर जुलूस निकला। इस दौरान सड़क पर मातमी करतब दिखाए गए। ताजियों को भी शामिल किया गया। जुलूस में शामिल लोगों ने कर्बला के शहीदों को याद किया। शहीदों की याद में मर्सिया पढ़ा गया। या-हुसैन, या-हुसैन की सदाएं गूंजती रहीं। उसके पहले नौवीं मुहर्रम की रात में शहर में जगह-जगह ताजिया का दीदार किया गया। बड़ी संख्या में महिलाओं और बच्चों ने भी ताजिया के पास फातिहा पढ़ा। वहां तबर्रुक भी बांटा गया।
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