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स्कूल का पता नहीं, कागजी कोरम से ट्रेनिंग ले रहे चालक

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कन्नौज। हैवी वाहन का लाइसेंस बनवाने से पहले ड्राइविंग प्रमाणपत्र जारी करने के नाम पर जिले में बड़ा खेल-खेला जा रहा है। ट्रेनिंग स्कूलों का अता-पता नहीं है। लाइसेंस बनवाने के लिए आने वाले लोगों को पांच-पांच हजार रुपये में प्रमाणपत्र जारी किए जा रहे हैं। खचाड़ा वाहनों को देखकर स्कूल की मान्यता दे दी गई है। एक भी स्कूल मानकों को पूरा नहीं कर रहा है।
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जिले में पांच ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल संचालित हैं। इनसे प्रमाणपत्र जारी होने के बाद ही हैवी वाहन चलाने का लाइसेंस जारी किया जाता है। विभाग की ओर से इसके लिए लिए पांच लोगों को लाइसेंस दिया गया है। नियमों के अनुसार चालक को हैवी वाहन चलाने के लाइसेंस से पहले स्कूल में दाखिला लेना होगा। यहां ट्रेनिंग पूरी करने के बाद हैवी वाहन चलाने के लाइसेंस के लिए आवेदन करना होता है।
जिले में पांच स्कूलों को ट्रेनिंग के लिए मान्यता दी गई है। यह स्कूल मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं। ट्रेनिंग देने के लिए इनके पास न कार है, न ही ट्रक या डीसीएम। स्कूल की बाबत कहीं बोर्ड भी नहीं लगा है। एआरटीओ कार्यालय के निकट बैठे स्कूल संचालक पांच-पांच हजार रुपये वसूल कर प्रमाणपत्र जारी कर रहे हैं। प्रमाण पत्र बनवाने के लिए आने वाले लोग पहले 25 सौ रुपये दाखिले के लिए जमा करते हैं। दाखिले की रसीद के 45 दिन बाद 25 सौ रुपये देकर स्कूल में पढ़ाई करने का प्रमाण पत्र पा लेते हैं। विभागीय अधिकारी इसी प्रमाणपत्र को मान्यता देते हुए हैवी लाइसेंस जारी कर देते हैं।
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ऑटोमेटिक ड्राइविंग ट्रैक सिस्टम के बिना जारी हो रहे डीएल
जिले में ऑटोमेटिक ड्राइविंग ट्रैक सिस्टम का अभी तक निर्माण नहीं कराया गया है। इसके बाद भी हैवी वाहन के ड्राइविंग लाइसेंस जारी हो रहे हैं। इस तरह से हैवी ड्राइविंग लाइसेंस बनवा लेने वाले लोगों से दुर्घटनाओं का खतरा बना हुआ है।
बोले जिम्मेदार
कार्यालय से लाइसेंस जारी करने से पहले परीक्षा ली जाती है। ऑनलाइन परीक्षा में पास होने के बाद ही लाइसेंस जारी किया जाता है। ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूलों की जांच उप परिवहन आयुक्त करते हैं। अगर स्कूलों के पास ट्रेनिंग के लिए वाहन नहीं है या ट्रेनिंग का स्थान नहीं है तो संबंधित की मान्यता समाप्त करने की कार्रवाई की जाती है।
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-संजय कुमार झा (एआरटीओ)
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